राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) हमेशा हिंदू और हिंदुत्व की बात करता आया है, लेकिन इसके बावजूद संगठन स्तर पर होली, दीवाली जैसे बड़े सनातनी त्योहार मनाने पर जोर नहीं देता। संघ के 100 साल पूरे होने पर इससे जुड़ी कई दिलचस्प बातें सामने आई हैं, जो संगठन की सोच और उसकी विशिष्टता को उजागर करती हैं। RSS का फोकस व्यक्तिगत या पारंपरिक त्योहारों पर नहीं, बल्कि संगठन, अनुशासन और सेवा के मूल सिद्धांतों पर रहता है।
संघ अपने कुछ तय पर्व और परंपराओं को बड़े धूमधाम से मनाता है, लेकिन इनका उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों को एकजुट करना और संगठनात्मक अनुशासन को मजबूत करना होता है। ये पर्व संगठन की सेवा और कार्यप्रणाली से जुड़े होते हैं और स्वयंसेवकों में एकजुटता, समर्पण और जिम्मेदारी की भावना पैदा करते हैं।
RSS की शाखाओं में विशेष तरह की प्रणाम करने की परंपरा भी होती है। इसमें सभी स्वयंसेवक एक साथ अनुशासित ढंग से प्रणाम करते हैं, अक्सर एक इशारे पर। यह सिर्फ शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि संगठन की अनुशासन और सामूहिकता को दिखाने वाला प्रतीक है। इसी वजह से यह संघ की अलग पहचान के रूप में मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि संघ की यह शैली इसे अन्य धार्मिक या सामाजिक संगठनों से अलग बनाती है। जहां अन्य संगठन त्योहारों और पारंपरिक रीतियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वहीं RSS का जोर हमेशा संगठन के मूल उद्देश्य और राष्ट्रीय स्वयंसेवक को तैयार करने पर रहता है।
संघ के इतिहास और परंपराओं में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उनका प्राथमिक उद्देश्य धार्मिक उत्सवों का आयोजन नहीं, बल्कि समाज में सेवा और अनुशासन के मूल्य स्थापित करना है। यही कारण है कि संघ के 100 साल पूरे होने पर भी यह सवाल उठता है कि यह संगठन अपने हिंदुत्व और सनातनी मूल्यों को किस तरह आगे बढ़ाता है।
RSS के स्वयंसेवक मानते हैं कि संगठन की शाखा गतिविधियों में शामिल होना और इन परंपराओं का पालन करना व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन दोनों में अनुशासन लाता है। यह संगठन की सोच और उद्देश्य को स्पष्ट करता है और युवा स्वयंसेवकों में नेतृत्व और जिम्मेदारी की भावना विकसित करता है।
इस तरह, RSS का त्योहारों पर रवैया उसकी अलग पहचान का हिस्सा है। यह दर्शाता है कि संगठन के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ अनुशासन, सेवा और संगठन की मजबूती है, न कि पारंपरिक धार्मिक उत्सवों का आयोजन। यही संघ की स्थायी पहचान और उसकी कार्यप्रणाली का मूल आधार है।
अंततः, RSS के 100 साल पूरे होने पर यह स्पष्ट हो गया है कि संगठन अपनी परंपराओं और नियमों के जरिए हिंदुत्व और समाज सेवा के मूल सिद्धांतों को आगे बढ़ाने पर जोर देता है। संगठन स्तर पर बड़े त्योहार न मनाना इसकी विशेष रणनीति और पहचान का हिस्सा है, जो इसे अन्य संगठनों से अलग बनाता है।
written by :- Anjali Mishra
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