नोएडा से मानवता को झकझोर देने वाली एक घटना सामने आई है, जहां एक वृद्धाश्रम में अपनों से ठुकराए बुज़ुर्गों को अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर किया गया। बिना कपड़ों, चादर और पंखे के चिलचिलाती गर्मी में बुज़ुर्गों को ऐसे हालात में रखा गया, मानो वे इंसान नहीं बल्कि किसी सज़ा के पात्र हों। यह दृश्य तब सामने आया जब महिला आयोग की सदस्य मीनाक्षी भराला निरीक्षण के लिए पहुंचीं और आंखों देखे हालात से आक्रोशित हो उठीं।
सबसे शर्मनाक बात तब सामने आई जब संस्था की ओर से जवाब दिया गया – “ये पागल हैं।” यह जवाब न सिर्फ असंवेदनशील था, बल्कि उस सोच को भी उजागर करता है जो बुज़ुर्गों को बोझ और मानसिक रोगी मानकर उनके अधिकारों को कुचलने की कोशिश करती है। लेकिन इसी भीड़ में एक बुज़ुर्ग डॉक्टर निकले, जिन्होंने बताया कि वे किस तरह से पढ़े-लिखे और समझदार हैं, लेकिन फिर भी अपमानजनक व्यवहार झेलने को मजबूर हैं।
राज्य महिला आयोग की सख्ती के बाद अब प्रशासन हरकत में आया है। आदेश जारी कर दिए गए हैं कि वृद्धाश्रम से UNTALIS (49) बुज़ुर्गों को तुरंत दूसरे सुरक्षित और सुविधाजनक आश्रय स्थल में स्थानांतरित किया जाए। हालांकि यह कदम राहत तो है, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि आखिर इस हालात तक बात पहुंची ही क्यों? क्या नियमित निरीक्षण और संवेदनशील प्रशासनिक निगरानी नहीं होनी चाहिए?
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यह घटना समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जिसमें बुज़ुर्गों को उनके परिवार और फिर समाज दोनों ही नजरअंदाज कर देते हैं। जब अपनों से दूरी हो जाती है, तो वे जिन संस्थाओं की ओर उम्मीद से देखते हैं, वहां भी उन्हें तिरस्कार और अमानवीयता का सामना करना पड़ता है। यह दर्शाता है कि हम एक ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां उम्रदराज होना एक अपराध बन गया है।
अब वक्त है कि सिर्फ राहत की बात न हो, बल्कि जवाबदेही तय हो। जिन संस्थाओं को बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए जिम्मेदार बनाया गया है, क्या उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? और क्या हमारा समाज अब भी यही मानता रहेगा कि बुज़ुर्गों की उपेक्षा एक आम बात है? अगर यह मानवता है, तो इससे शर्म आनी चाहिए। जरूरत है संवेदनशील सोच, मजबूत प्रशासन और जवाबदेह समाज की, ताकि हर बुज़ुर्ग को जीने का सम्मान मिल सके।
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