कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में आयोजित #OperationSindoor_Cup क्रिकेट मैच का माहौल जहां एक ओर महिला सशक्तिकरण और सामाजिक संदेशों से भरा था, वहीं दूसरी ओर यह आयोजन अचानक विवाद और टकराव की भेंट चढ़ गया, जब स्टेडियम की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बीजेपी के एमएलसी अरुण पाठक और महिला आईपीएस अधिकारी अंजलि विश्वकर्मा आमने-सामने आ गए। एक ओर यह कार्यक्रम महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को प्रोत्साहित करने के मकसद से किया गया था, लेकिन दूसरी ओर मंच पर ही महिला अधिकारी और एक सत्तारूढ़ दल के नेता के बीच जो हुआ, उसने पूरे आयोजन की मंशा पर भी सवाल खड़े कर दिए।
घटना की शुरुआत उस वक्त हुई जब एमएलसी अरुण पाठक अपने गनर के साथ स्टेडियम परिसर में पहुंचे। आईपीएस अंजलि विश्वकर्मा ने इस पर आपत्ति जताते हुए सुरक्षा प्रोटोकॉल का हवाला दिया, यह कहते हुए कि ऐसे आयोजनों में अनधिकृत हथियारों और सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी आयोजन की गरिमा और सुरक्षा दोनों के लिए खतरा है। इसी बात पर दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई, जो धीरे-धीरे तीखी बहस में बदल गई। मौके पर मौजूद अधिकारी और पुलिसकर्मी स्थिति को संभालते, इससे पहले ही दोनों की आवाजें तेज़ हो चुकी थीं और वहां मौजूद मीडियाकर्मी और दर्शक तमाशबीन बन गए।
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इस बहस के सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। एक ओर बीजेपी कार्यकर्ता इसे विधायकों की गरिमा और प्रोटोकॉल के उल्लंघन का मामला बता रहे हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष और नागरिक समाज महिला अधिकारी के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर #AnjaliVishwakarma, #ArunPathak, #IPSvsMLC, #OperationSindoor_Cup और #PublicShowdown जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई महिला संगठनों और प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारियों ने अंजलि विश्वकर्मा के रुख को अनुशासन और प्रोफेशनलिज्म की मिसाल बताते हुए उनके समर्थन में बयान दिए हैं।
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि सुरक्षा नियमों से ऊपर हैं? क्या एक महिला अधिकारी की दृढ़ता और नियम पालन की कोशिश को ‘राजनीतिक अहं’ का सामना करना पड़ेगा? या यह घटना आने वाले समय में राजनीति और प्रशासन के रिश्ते को फिर से परिभाषित करेगी? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और महिला अधिकारियों को दिए गए सम्मान के दावे भी अब परख के दौर में हैं। यदि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया गया, तो यह आने वाले समय में एक नजीर बन सकता है, लेकिन अगर इसे सिर्फ “मैच के दौरान हुई मामूली बहस” कहकर नजरअंदाज कर दिया गया, तो यह पूरे प्रशासनिक ढांचे के आत्मसम्मान और निष्पक्षता पर बड़ा सवाल होगा।
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