लखनऊ, जिसे नवाबों का शहर कहा जाता है, हमेशा से अपनी तहज़ीब, नज़ाकत और स्वाद के लिए मशहूर रहा है। यहां हर त्योहार, हर आयोजन शालीनता और गरिमा के साथ मनाया जाता है, लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। उत्तर प्रदेश के राजधानी शहर लखनऊ में आयोजित ‘उत्तर प्रदेश आम महोत्सव’ का अंतिम दिन ऐसा नज़ारा लेकर आया, जिसे देखकर आयोजक से लेकर स्टॉल संचालक तक हैरान रह गए। तीन दिनों तक चले इस आयोजन में सैकड़ों किस्मों के आम प्रदर्शित किए गए थे। पूरे आयोजन में आम के स्वाद के साथ संस्कृति और किसानी की मेहनत का संगम दिखाई दिया, लेकिन जैसे ही आखिरी दिन की घड़ी आई – पूरा नज़ारा ही बदल गया।
अंतिम दिन की भीड़ कुछ ज्यादा ही उमड़ी थी। मौसम भी आमों के अनुकूल था, और लोगों की जेब में झोले, बैग और टोकरे पहले से मौजूद थे। आयोजकों को अंदेशा नहीं था कि जनता का आम प्रेम इस कदर उफान पर होगा। जैसे ही कुछ स्टॉल्स ने बचे हुए आमों को रिसाइकल या वापस भेजने की तैयारी शुरू की, लोग टूट पड़े। रिसाइकल बिन तक जनता ने खाली कर डाले। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं – सभी इस ‘मैंगो मिशन’ में शामिल हो गए। जिस शालीनता की मिसाल लखनऊ देता है, वह इस भीड़ में कहीं गुम हो गई थी।
देशभर से आए आम उत्पादकों और स्टॉल संचालकों ने शायद ही कभी ऐसा दृश्य देखा हो। उनके लिए यह केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने का एक गर्वपूर्ण अवसर था। लेकिन अंतिम दिन की ‘आम लूट’ ने उन्हें असमंजस में डाल दिया। कोई कंधा उचकाता दिखा, कोई बैग छुपाता, तो कोई आम के थैले लेकर स्टॉल से भागता नजर आया। कई स्टॉल मालिक तो समय से पहले ही अपने बचे हुए आम समेटकर निकल गए, ताकि उन्हें नुकसान न हो। वहीं कुछ ने मुस्कुराकर इसे “भारत की आम जनता का आम प्रेम” कहकर टाल दिया।
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महोत्सव का उद्देश्य था कि आम को किसानों की मेहनत के प्रतीक के रूप में सम्मान मिले, और जनता को भी नई-नई किस्मों से परिचय कराया जाए। पहले दो दिन यही मकसद सफल भी रहा, जब स्कूलों के बच्चों, आम उपभोक्ताओं और शहरवासियों ने स्टॉल पर आमों की किस्में चखी, खरीदी और किसानों से संवाद किया। पर अंतिम दिन की अफरा-तफरी ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि क्या ऐसे आयोजनों में जनता की जागरूकता और आयोजकों की तैयारी दोनों को और गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं?
इस पूरी घटना ने सोशल मीडिया पर भी हलचल मचा दी। वीडियो और तस्वीरें वायरल होने लगीं, जिनमें लोग झोले भर-भर कर आम लेकर जाते नजर आए। कुछ लोगों ने इसे ‘लखनऊ की आम जनता का आम उत्सव’ बताया, तो कुछ ने इसे अनुशासनहीनता का उदाहरण कहा। पर एक बात तो साफ है – आमों को लेकर जो दीवानगी लखनऊ में देखने को मिली, वो शायद ही देश के किसी और हिस्से में नजर आए। अब अगली बार जब आम महोत्सव का आयोजन होगा, तो आयोजकों के साथ-साथ सुरक्षा कर्मियों की संख्या भी शायद दोगुनी करनी पड़ेगी। आखिर लखनऊ की जनता है – शिष्ट भी है, लेकिन आमों पर थोड़ी आमदीपन भी दिखा देती है!
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