उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी’ को लेकर रिलीज से पहले ही बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। फिल्म के निर्माताओं ने सेंसर बोर्ड (CBFC) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बोर्ड जानबूझकर फिल्म, ट्रेलर और प्रोमो गानों को सर्टिफिकेट देने में “मनमानी और अस्पष्ट” ढंग से देरी कर रहा है। यह मामला अब इतना बढ़ गया है कि निर्माता न्याय की तलाश में बॉम्बे हाईकोर्ट तक पहुंच गए हैं।
फिल्म के प्रमोटरों का कहना है कि उन्होंने CBFC के सभी निर्देशों का पालन किया है और समय रहते आवेदन जमा कर दिए थे। लेकिन फिर भी बोर्ड की तरफ से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला और प्रक्रिया टाल-मटोल का शिकार हो गई। निर्माताओं का आरोप है कि यह देरी सामान्य नहीं बल्कि जानबूझकर की गई प्रतीत होती है, जिससे फिल्म की तय रिलीज डेट और मार्केटिंग प्लान पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
यह फिल्म योगी आदित्यनाथ के जीवन के संघर्षों, गोरखनाथ मठ से मुख्यमंत्री बनने तक की यात्रा और सामाजिक बदलाव में उनकी भूमिका को दर्शाती है। स्वाभाविक है कि ऐसी फिल्म राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मानी जा सकती है। सूत्रों का दावा है कि फिल्म में कुछ दृश्य या संवाद संभवतः विवादास्पद माने जा सकते हैं, जिससे सेंसर बोर्ड पर अतिरिक्त दबाव हो सकता है। हालांकि, निर्माता इन सभी अटकलों को खारिज करते हुए इसे “प्रेरणादायक बायोपिक” बताते हैं।
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फिल्म इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि हाल के वर्षों में कई फिल्मों को सेंसर बोर्ड की तरफ से अनावश्यक रूप से रोका गया है, खासकर जब उनमें राजनीतिक या धार्मिक संदर्भ शामिल हों। ‘अजेय’ के मामले में भी यही सवाल उठ रहा है — क्या यह महज तकनीकी देरी है या किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम? निर्माताओं का दावा है कि फिल्म का हर पहलू तथ्यात्मक और कानूनी रूप से सुरक्षित है, और इसे जानबूझकर रोकना रचनात्मक स्वतंत्रता पर हमला है।
फिल्म की टीम का कहना है कि अगर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में और देरी हुई, तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान होगा और पहले से तय प्रमोशनल कैंपेन, थिएटर बुकिंग और मीडिया प्लान सब अस्त-व्यस्त हो जाएंगे। हाईकोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि CBFC को जल्द से जल्द स्पष्ट कारण बताने और तय समयसीमा में सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया जाए।
अब सबकी निगाहें बॉम्बे हाईकोर्ट पर हैं, जहाँ यह तय होगा कि ‘अजेय’ को हरी झंडी मिलेगी या नहीं। यह मामला सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में फिल्म निर्माण और सेंसरशिप की स्वतंत्रता को लेकर भी बड़ा संकेत बन सकता है। अगर यह फिल्म रिलीज में देरी का शिकार होती है, तो यह न केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाएगा, बल्कि दर्शकों को भी एक प्रेरणादायक कहानी से वंचित कर देगा।
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