मुंबई में एक जनसभा के दौरान महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने हिंदी भाषा को लेकर केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने केंद्र की उस नीति की तीखी आलोचना की जिसमें पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी भाषा को अनिवार्य बनाने की बात सामने आई थी। ठाकरे ने साफ शब्दों में कहा कि महाराष्ट्र में इस तरह की भाषा थोपने की कोशिश को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनका यह बयान मराठी अस्मिता की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके सियासी मायने भी कम नहीं हैं।
राज ठाकरे ने इस मुद्दे पर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे को खासतौर पर निशाने पर लिया। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा—”तुम मुंबई आ जाओ, समुंदर में डुबो-डुबो कर मारेंगे।” ठाकरे के इस बयान से राजनीति में भूचाल आ गया है। जहां कुछ इसे मराठी स्वाभिमान की आवाज कह रहे हैं, वहीं कई लोग इसे उकसावे और क्षेत्रीय कट्टरता की राजनीति बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह बयान वायरल हो गया और मराठी बनाम हिंदी की बहस एक बार फिर तेज हो गई।
बीजेपी खेमे ने इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया है। सांसद निशिकांत दुबे ने पलटवार करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक देश में इस तरह की भाषा और धमकी का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी देश की राजभाषा है और किसी भी राज्य में इसका विरोध करना देश की एकता को चोट पहुंचाना है। साथ ही उन्होंने ठाकरे के बयान पर कार्रवाई की मांग की है और इसे संसद में उठाने की बात भी कही है।
वहीं, महाराष्ट्र की राजनीति में इस बयान ने नया मोड़ ला दिया है। शिवसेना (शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) दोनों ही इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि उद्धव ठाकरे गुट ने राज ठाकरे के बयान से खुद को अलग करते हुए इसे अनावश्यक उत्तेजना फैलाने वाला कहा है। कांग्रेस ने भी इसे “भाषाई राजनीति” का खतरनाक उदाहरण बताया है और केंद्र से स्पष्टता की मांग की है कि क्या हिंदी को अनिवार्य किया जा रहा है या नहीं।
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जनता के बीच भी इस बयान ने दोराय पैदा कर दी है। जहां एक तबका राज ठाकरे की बात को मराठी गौरव की रक्षा मान रहा है, वहीं दूसरा तबका मानता है कि भाषा के नाम पर देश के भीतर विभाजनकारी रेखाएं खींचना खतरनाक है। छात्रों और अभिभावकों के बीच भी इसको लेकर भ्रम की स्थिति है कि क्या सच में केंद्र सरकार हिंदी को अनिवार्य करने जा रही है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भाषा नीति को लेकर देश में कोई स्पष्ट और सर्वमान्य दिशा है? हिंदी को थोपने और क्षेत्रीय भाषाओं को कमजोर करने के आरोप कोई नए नहीं हैं, लेकिन हर बार जब यह मुद्दा उठता है, देश की एकता और विविधता की बहस फिर से गरमा जाती है। राज ठाकरे के बयान ने इस बहस को न सिर्फ फिर से जिंदा किया है, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति को भी गरमा दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बयान का असर राजनीतिक समीकरणों पर कितना और कैसे पड़ता है।
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