लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान ने सियासी और सामाजिक हलकों में खासा ध्यान खींचा है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने एक बेहद संतुलित और जिम्मेदाराना टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि “आपसी भाईचारा और मुल्क की एकता हम सबकी जिम्मेदारी है,” जो एक समावेशी और सकारात्मक सोच को दर्शाता है।
मौलाना यासूब अब्बास ने यह भी स्पष्ट किया कि जब समाज को बांटने की कोशिशें की जा रही हैं, तब सभी धर्मों, संप्रदायों और जातियों के लोगों को एकजुट होकर ऐसे प्रयासों का विरोध करना चाहिए। उनका यह बयान न केवल RSS के बयान के जवाब में आया, बल्कि यह समाज के हर वर्ग को एक मजबूत सामाजिक संदेश भी देता है — कि भारत की एकता किसी एक संगठन या वर्ग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी की साझी विरासत है।
यह बयान उस समय आया है जब देश में कई मुद्दों को लेकर साम्प्रदायिक तनाव की आशंकाएं जताई जा रही हैं। ऐसे माहौल में एक मुस्लिम धर्मगुरु का यह कहना कि देश की एकता को बनाकर रखना हर नागरिक की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, यह दर्शाता है कि धार्मिक नेता भी अब समाज को जोड़ने वाली भूमिका में सक्रिय हो रहे हैं।
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मौलाना ने यह भी परोक्ष रूप से संदेश दिया कि धर्म और आस्था का इस्तेमाल लोगों को जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करने के लिए। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे धर्म, जाति या मज़हब के नाम पर किसी भी प्रकार की नफरत से बचें और देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को बनाए रखें।
इस तरह, RSS और मुस्लिम धर्मगुरु दोनों के सुर इस बार एकजुटता और भाईचारे के पक्ष में सुनाई दिए हैं। यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए सकारात्मक संकेत है, जहाँ विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन देश की एकता और अखंडता को लेकर सबकी सोच एक होनी चाहिए।
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