उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में ‘पीडीए पाठशाला’ नामक कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला उस समय सामने आया जब प्रशासन ने समाजवादी पार्टी की नेत्री अंजनी सरोज पर गंभीर आरोप लगाए। प्रशासन के अनुसार, अंजनी सरोज ने एक बंद पड़े सरकारी स्कूल में बिना अनुमति के कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें कथित रूप से बच्चों को स्कूल ड्रेस में बुलाकर उन्हें चॉकलेट और पेंसिल का लालच दिया गया।
यह घटना खासतौर पर इसलिए संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि यह सरकारी संपत्ति और बच्चों के इस्तेमाल से जुड़ी हुई है। प्रशासन का कहना है कि यह एक सुनियोजित राजनीतिक प्रचार का हिस्सा था, जिसे मासूम बच्चों और सरकारी स्कूल की इमारत के माध्यम से अंजाम दिया गया। इससे न केवल सरकारी नियमों की अवहेलना हुई, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गरिमा को भी ठेस पहुंची है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अंजनी सरोज के खिलाफ IPC की धारा 329(4) और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम (Public Property Act) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। धारा 329(4) आमतौर पर धोखाधड़ी, गलत उद्देश्य से लाभ उठाने या जनहित को क्षति पहुंचाने जैसे मामलों में लगाई जाती है। वहीं, Public Property Act के तहत बिना अनुमति सरकारी संपत्ति का प्रयोग और क्षति दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
गौरतलब है कि अंजनी सरोज 2022 के विधानसभा चुनावों में औराई सीट से सपा की प्रत्याशी रह चुकी हैं। इसलिए इस पूरे मामले को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जा रहा है। सपा समर्थकों का दावा है कि यह कार्रवाई बदले की राजनीति का हिस्सा है, जबकि प्रशासन इसे कानून और प्रक्रिया की रक्षा के रूप में पेश कर रहा है।
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यह मामला केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि इससे यह भी उजागर होता है कि राजनीतिक दल किस तरह से जनसंपर्क अभियानों में नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या शिक्षा और बच्चों को राजनीतिक एजेंडा साधने का माध्यम बनाया जाना चाहिए?
अब देखना यह होगा कि यह मामला आगे किस दिशा में बढ़ता है। क्या अंजनी सरोज पर लगे आरोपों में कोई ठोस प्रमाण सामने आते हैं या यह विवाद महज राजनीतिक रस्साकशी बनकर रह जाता है? फिलहाल प्रशासन और सपा दोनों अपनी-अपनी स्थिति पर कायम हैं, लेकिन इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति में हलचल जरूर पैदा कर दी है।
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