सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घुसपैठियों और रोहिंग्या प्रवासियों पर एक ऐसा कड़ा और साफ संदेश दिया है, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जो लोग अवैध रूप से भारत में प्रवेश करते हैं, वे किसी भी कानूनी अधिकार के हकदार नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ नहीं, बल्कि CJI सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान यह निर्णायक टिप्पणी की, और यह टिप्पणी सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, नीति और मानवीयता के बीच की खींचतान को भी सामने लाती है।
सुनवाई के दौरान रोहिंग्याओं की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उन्हें शरणार्थी माना जाए। इसी बात पर कोर्ट ने तुरंत आपत्ति जताई। CJI ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोर्ट मानवीय दृष्टिकोण को समझता है, लेकिन इससे किसी का कानूनी दर्जा नहीं बदल जाता। अवैध प्रवेश करने वाला व्यक्ति चाहे कितनी भी दयनीय स्थिति में हो, कानून उसकी स्थिति को वैध नहीं बना सकता। अदालत ने कहा कि देश के आम नागरिकों को भी समझना चाहिए कि पूर्वोत्तर और पूर्वी राज्यों में यह समस्या कितनी गंभीर है जहाँ घुसपैठ का सीधा असर जनसांख्यिकी से लेकर सुरक्षा तक पर पड़ता है।
सबसे ज्यादा चर्चा में रहा CJI का वो तीखा सवाल जिसने पूरे कोर्टरूम में सन्नाटा ला दिया। उन्होंने कहा –“पहले आप अवैध तरीके से सीमा पार करते हैं, अंदर आते हैं, और फिर कहते हैं कि अब आपको खाना, आश्रय और बच्चों की शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए? क्या कानून को इस तरह मोड़ा जा सकता है?”
यह सवाल सिर्फ याचिकाकर्ता से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम और उन लापरवाहियों से था जो वर्षों से इस संकट को बढ़ाती रही हैं। अदालत का यह संदेश साफ है भारत संवेदनशील है, लेकिन भोला नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मानवता के नाम पर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। मानवीय सहायता दी जा सकती है, लेकिन किसी अवैध प्रवासी को भारतीय नागरिकों के बराबर अधिकार नहीं दिए जा सकते। ये टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश के कई हिस्सों में रोहिंग्या शेल्टर, फर्जी दस्तावेज़, और पहचान बदलने जैसे मामले तेज़ी से पकड़ में आ रहे हैं। CJI के बयान ने उन चिंताओं पर भी मुहर लगा दी जो लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियां उठाती रही हैं।
सुनवाई में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भारत हर संकटग्रस्त समुदाय के प्रति सहानुभूति रखता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि लोग सीमा तोड़कर आएँ और फिर न्यायालय से वैसे ही अधिकार माँगें जैसे भारतीय नागरिकों को मिलते हैं। कोर्ट ने साफ कहा मानवीयता कानून नहीं बदलती, और कानून भावना से नहीं चलता। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में कई याचिकाएँ दाखिल हुईं, जिनमें रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा देने की मांग उठाई गई थी।
इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। कई दल इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बता रहे हैं, तो कई इसे मानवीय दृष्टिकोण से देखने की अपील कर रहे हैं। लेकिन कोर्ट ने साफ कर दिया यह भावनाओं की नहीं, कानून की बात है। इस बयान के बाद चर्चा का केंद्र सिर्फ एक सवाल बन गया है क्या अब अवैध घुसपैठियों पर देशव्यापी कड़ा एक्शन शुरू होगा?
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ, तीखा और बेबाक है भारत दरवाज़े बंद नहीं कर रहा, लेकिन कानून के कंधे पर भावना की बंदूक भी नहीं चलने देगा।
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