बिहार की राजनीति इन दिनों एक नई हवा पकड़ रही है, और इस हवा के केंद्र में हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार। पटना में जिस तरह JDU के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय झा ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिए, उसने राजनीतिक गलियारों में अचानक हलचल तेज कर दी है। संजय झा ने साफ कहा कि पार्टी नेताओं और समर्थकों की इच्छा है कि निशांत राजनीति में उतरें और JDU की बड़ी जिम्मेदारी अपने हाथों में लें। यह बयान यूं ही नहीं दिया गया इसने उन सभी अटकलों को और मजबूत कर दिया है जो कई सालों से दबे स्वर में चलती रही थीं। अब सवाल यह नहीं कि निशांत राजनीति में आएंगे या नहीं, बल्कि यह बन गया है कि वे कब और किस भूमिका में अपनी पारी की शुरुआत करेंगे।
कहा जा रहा है कि पार्टी के कई सीनियर नेता लंबे समय से नीतीश कुमार को समझाते रहे हैं कि पार्टी को भविष्य की नई दिशा देने के लिए अब अगली पीढ़ी को सामने लाने का वक्त आ गया है। ऐसे में अगर निशांत मैदान में उतरते हैं, तो JDU को एक नई पहचान भी मिल सकती है और नई ऊर्जा भी। दिलचस्प बात यह है कि निशांत अब तक हमेशा मंच से दूर, कैमरे से दूर और राजनीति से ही दूरी बनाए रखे हुए दिखे हैं। वे दिल्ली में रहकर अपना काम करते हैं, और शायद ही कभी राजनीतिक कार्यक्रमों में दिखाई देते हैं। लेकिन अक्सर राजनीति उन्हीं लोगों को अपनी ओर खींच लेती है, जो उससे सबसे ज्यादा दूरी बनाने की कोशिश करते हैं।
नीतीश कुमार का अब तक का राजनीतिक सफर लंबे अनुभव, शांत छवि और प्रशासनिक कुशलता से भरा रहा है। लेकिन बढ़ती उम्र और बिहार की राजनीति के लगातार बदलते समीकरणों के बीच JDU का भविष्य किसके हाथ में होगा यह चिंता पार्टी के भीतर काफी समय से मौजूद है। इसलिए यह स्वाभाविक भी है कि पार्टी चाहती है कि निशांत की एंट्री से संगठन को एक स्थिर नेतृत्व की ओर बढ़ने का अवसर मिले। इसके अलावा विरोधी दल जिस तरह लगातार नीतीश कुमार पर हमले करते हैं, ऐसे में अगली पीढ़ी का राजनीतिक चेहरा सामने आने से पार्टी को एक नई रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि इसी बीच एक और दिलचस्प पहलू सामने आता है निशांत खुद राजनीति में आने को लेकर क्या सोचते हैं? संजय झा ने साफ कहा कि अंतिम फैसला उनका ही होगा, और वही तय करेंगे कि सही वक्त कौन सा है। यह बयान यह भी संकेत देता है कि निशांत के मन में कहीं न कहीं राजनीति को लेकर विचार जरूर चल रहे हैं, लेकिन अभी वे तैयार हैं या नहीं, यह पूरी तरह उनके निजी निर्णय पर निर्भर करता है। शायद यही वजह है कि उनके नाम के साथ रहस्य का एक आवरण जुड़ा हुआ है, जो उन्हें और भी दिलचस्प बनाता है।
बिहार की राजनीति में अक्सर परिवारवाद की चर्चा होती रही है, लेकिन नीतीश कुमार हमेशा इस दायरे से दूर माने जाते थे। अब अगर निशांत राजनीति में आते हैं, तो यह बिहार में सत्ता की धारा को कई दिशाओं में मोड़ सकता है। विपक्ष भी इस कदम पर अपनी रणनीति तैयार करने लगेगा, क्योंकि नीतीश के बाद निशांत की छवि और कार्यशैली भी वोटरों के बीच एक महत्वपूर्ण विषय बन जाएगी। इसमें कोई शक नहीं कि युवा नेतृत्व की एंट्री हमेशा लोगों के बीच नई उम्मीदें जगाती है, खासकर ऐसे राज्य में जहां राजनीतिक उतार-चढ़ाव कभी रुकते ही नहीं।
पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह यह चर्चा तेज है कि क्या यह बदलाव जल्दी होने वाला है या अभी इसमें समय लगेगा। लेकिन इतना जरूर है कि बिहार का राजनीतिक परिदृश्य इस संभावित बदलाव की आहट को गंभीरता से ले रहा है। नीतीश कुमार की पहचान एक ऐसे नेता की रही है जो हर बड़े फैसले में समय लेते हैं, लेकिन जब कदम बढ़ाते हैं, तो वह राजनीति की दिशा बदल देते हैं। इसलिए निशांत की एंट्री अगर होती है, तो यह सिर्फ JDU ही नहीं बल्कि बिहार की पूरी राजनीति के लिए एक नया दौर शुरू होने जैसा होगा।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि निशांत कुमार का अगला कदम क्या होगा क्या वे अचानक किसी राजनीतिक कार्यक्रम में दिखाई देंगे? क्या वे जेडीयू की किसी बड़ी बैठक में शामिल होंगे? या फिर क्या कोई बयान उनके भविष्य की दिशा साफ करेगा? जो भी हो, एक बात तो तय है बिहार की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए उनका वारिस मंच पर आने वाला है?
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