देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। पेपर लीक विवाद के बाद आयोजित की जा रही पुनर्परीक्षा में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। देश के 551 शहरों और विदेश के 14 शहरों में आयोजित इस परीक्षा में करीब 22.79 लाख अभ्यर्थी शामिल हो रहे हैं। परीक्षा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए एयरफोर्स की मदद से प्रश्नपत्रों का परिवहन किया गया, 51 हजार से अधिक जैमर्स लगाए गए, डेढ़ लाख हाई-सिक्योरिटी कैमरे सक्रिय किए गए और लगभग ढाई लाख पुलिसकर्मियों के साथ 15 हजार पैरामिलिट्री जवान तैनात किए गए। सरकार और एजेंसियों का दावा है कि इस बार किसी भी तरह की गड़बड़ी की संभावना को न्यूनतम करने की कोशिश की गई है।
लेकिन परीक्षा शुरू होते ही एक ऐसी घटना सामने आई जिसने सुरक्षा व्यवस्था से ज्यादा संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण पर सवाल खड़े कर दिए। एक छात्रा के परिवार का आरोप है कि वह परीक्षा केंद्र पर दोपहर 1:31 बजे पहुंची, जबकि गेट 1:27 बजे ही बंद कर दिए गए थे। परिवार ने परीक्षा केंद्र प्रशासन से छात्रा को प्रवेश देने की अपील की, लेकिन उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद छात्रा का पूरा साल दांव पर लग गया और परिवार निराश होकर लौट गया।
यह घटना इसलिए भी चर्चा का विषय बन गई है क्योंकि NEET जैसी परीक्षा के लिए छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं। कई परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करते हैं, बच्चे सामाजिक और मानसिक दबाव झेलते हैं, और उनका पूरा भविष्य इस एक परीक्षा पर टिका होता है। ऐसे में कुछ मिनट की देरी के कारण किसी अभ्यर्थी को परीक्षा से वंचित कर देना कई लोगों को कठोर और असंवेदनशील निर्णय लग रहा है।
दूसरी ओर परीक्षा एजेंसियों का तर्क है कि समय सीमा का पालन करना सुरक्षा और निष्पक्षता के लिए आवश्यक है। यदि एक छात्र को देरी के बाद प्रवेश दिया जाता है, तो भविष्य में अन्य मामलों में भी अपवाद बनाने का दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि परीक्षा संचालन में निर्धारित नियमों को सख्ती से लागू किया जाता है ताकि सभी अभ्यर्थियों के लिए समान व्यवस्था बनी रहे।
हालांकि आलोचकों का सवाल है कि जब देश में बार-बार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, जांच और पुनर्परीक्षा जैसी घटनाएं होती हैं, तब व्यवस्था की गलतियों का बोझ अक्सर छात्रों पर ही क्यों पड़ता है? उनका कहना है कि लाखों छात्रों को दोबारा परीक्षा देने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन यदि कोई छात्र कुछ मिनट देर से पहुंच जाए तो उसके लिए कोई राहत व्यवस्था नहीं होती। यही विरोधाभास अब बहस का केंद्र बन गया है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नियम आवश्यक हैं, लेकिन नियमों के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है। यदि किसी छात्र की देरी ट्रैफिक, तकनीकी समस्या, सुरक्षा जांच या अन्य वास्तविक कारणों से हुई हो, तो ऐसे मामलों के लिए एक स्पष्ट अपील या समीक्षा प्रणाली होनी चाहिए। इससे नियम भी बने रहेंगे और योग्य छात्रों के साथ अन्याय की भावना भी कम होगी।
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है। कई लोग छात्रा के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं और पूछ रहे हैं कि जब परीक्षा प्रणाली की बड़ी विफलताओं के कारण लाखों छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ सकती है, तो 3 या 4 मिनट की देरी पर किसी छात्र का पूरा शैक्षणिक वर्ष क्यों समाप्त मान लिया जाता है। वहीं कुछ लोग नियमों के समान अनुपालन की जरूरत पर भी जोर दे रहे हैं।
असल सवाल केवल एक छात्रा का नहीं है, बल्कि उस संतुलन का है जहां परीक्षा की निष्पक्षता और छात्रों के भविष्य दोनों को समान महत्व दिया जा सके। देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक NEET से जुड़ी यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि शिक्षा व्यवस्था में सुरक्षा के साथ-साथ संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है।
written by :-Anjali Mishra
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