मध्य पूर्व में एक बार फिर हालात तेजी से बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में हुए युद्धविराम के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव कम होगा, लेकिन अब घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजर रहे सिंगापुर के झंडे वाले एक कार्गो जहाज़ पर ड्रोन हमला हुआ, जिसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई फिर शुरू हो गई। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में एक बार फिर युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए हैं और दुनिया की नजरें अब खाड़ी क्षेत्र पर टिक गई हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने इस ड्रोन हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराते हुए जवाबी कार्रवाई की। अमेरिकी सेना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों, मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज साइट्स तथा तटीय रडार ठिकानों पर हवाई हमले किए। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई व्यावसायिक जहाज़ों की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता बनाए रखने के उद्देश्य से की गई। हालांकि ईरान ने अमेरिकी आरोपों और कार्रवाई को लेकर अपनी अलग दलील पेश की है।
दूसरी ओर, ईरान ने भी अमेरिकी कार्रवाई का जवाब देने का दावा किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। बहरीन और कुवैत जैसे देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार बड़े पैमाने पर किसी जान-माल के नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र में तनाव को कई गुना बढ़ा दिया है।
सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि करीब दस दिन पहले जिस युद्धविराम पर सहमति बनी थी, वह अब गंभीर संकट में दिखाई दे रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद हालात फिर से सैन्य संघर्ष की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं, जिससे यह आशंका भी बढ़ गई है कि यदि समय रहते तनाव कम नहीं हुआ तो यह टकराव और व्यापक रूप ले सकता है।
होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में लगातार हमले होते रहे या जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित हुई, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में तेजी, शिपिंग लागत में बढ़ोतरी और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं, जिसका असर दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच यह सैन्य टकराव लगातार बढ़ता है, तो केवल मध्य पूर्व ही नहीं बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका तक आर्थिक प्रभाव महसूस किए जा सकते हैं। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति महंगाई और ईंधन संकट को और गंभीर बना सकती है। समुद्री बीमा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक बाजारों में भी अनिश्चितता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
फिलहाल दोनों देशों की ओर से सख्त बयानबाजी जारी है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है। कई देश तनाव कम करने और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं ताकि स्थिति पूर्ण युद्ध में न बदले। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि आने वाले दिनों में संघर्ष और बढ़ेगा या फिर कूटनीतिक प्रयासों से हालात नियंत्रित हो पाएंगे।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि होर्मुज़ स्ट्रेट में हुए इस ताजा घटनाक्रम ने युद्धविराम की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। यदि आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच बातचीत की बजाय सैन्य कार्रवाई जारी रहती है, तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है। अभी सभी की नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीति इस संकट को रोक पाएगी या फिर मध्य पूर्व एक बड़े संघर्ष की ओर बढ़ रहा है।
written by:- Anjali Mishra
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