मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक नई घटना ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। खबर सामने आई कि रूस का एक विशेष विमान तेहरान पहुंचा है। इसके बाद सोशल मीडिया पर दावा किया जाने लगा कि यह रूस का तथाकथित “Doomsday Plane” है। हालांकि, इस दावे की अब तक किसी भी आधिकारिक या स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी इस खबर ने वैश्विक स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या रूस ईरान के साथ खुलकर खड़ा होने की तैयारी कर रहा है, या यह केवल एक नियमित सरकारी या सैन्य उड़ान थी? फिलहाल इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आए हैं, लेकिन चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
“Doomsday Plane” शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर ऐसे विशेष विमानों के लिए किया जाता है, जिन्हें परमाणु युद्ध या राष्ट्रीय आपातकाल जैसी परिस्थितियों में शीर्ष नेतृत्व के कमांड सेंटर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। रूस, अमेरिका और कुछ अन्य देशों के पास ऐसे विशेष विमान होने की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। लेकिन तेहरान पहुंचे विमान को लेकर जो दावे सोशल मीडिया पर किए जा रहे हैं, वे अभी तक प्रमाणित नहीं हैं। इसलिए इसे तथ्य की तरह नहीं, बल्कि अपुष्ट दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन रास्तों में गिना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या अवरोध केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक चिंता का विषय बन जाता है। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां इस इलाके की हर गतिविधि पर बारीकी से नजर रख रही हैं।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान देकर बहस और तेज कर दी। उन्होंने कहा कि अब अमेरिका खुद को “गार्जियन ऑफ द हॉर्मुज स्ट्रेट” मानेगा और इस रणनीतिक समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले सभी कार्गो पर 20 प्रतिशत शुल्क लिया जाएगा। यदि इस तरह की नीति लागू होती है, तो इसका असर वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। हालांकि ऐसी किसी व्यवस्था को लागू करने की कानूनी और व्यावहारिक प्रक्रिया जटिल मानी जाती है।
ट्रंप के इस बयान को कई विश्लेषक ईरान के लिए कड़ा राजनीतिक संदेश मान रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिका यह संकेत देना चाहता है कि वह हॉर्मुज स्ट्रेट में अपनी सैन्य और रणनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करेगा। दूसरी ओर, ईरान लंबे समय से इस क्षेत्र में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बयानबाजी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में और तेज हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात को केवल अमेरिका और ईरान के बीच का विवाद मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे बदलती वैश्विक शक्ति व्यवस्था भी एक महत्वपूर्ण कारक है। एक ओर अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहता है, वहीं रूस और चीन जैसे देश भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मध्य पूर्व एक बार फिर वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रमुख केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।
रूस और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, ऊर्जा और कूटनीतिक सहयोग बढ़ा है। यही कारण है कि तेहरान में किसी भी रूसी गतिविधि को दुनिया गंभीरता से देखती है। हालांकि, केवल किसी विशेष विमान के पहुंचने से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि रूस सीधे किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होने जा रहा है। जब तक आधिकारिक पुष्टि या विश्वसनीय साक्ष्य सामने न आएं, ऐसे दावों को सावधानी से देखना जरूरी है।
यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में तेजी, समुद्री व्यापार में बाधा, बीमा लागत में वृद्धि और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। भारत सहित कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं। इसलिए यहां की हर सैन्य या राजनीतिक गतिविधि का असर अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें तेहरान, वॉशिंगटन और मॉस्को पर टिकी हुई हैं। रूस के विशेष विमान को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन उनकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। वहीं अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, हॉर्मुज स्ट्रेट की रणनीतिक अहमियत और महाशक्तियों की सक्रियता इस पूरे घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील बना रही है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक फैसले, सैन्य गतिविधियां और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं तय करेंगी कि यह तनाव बातचीत से कम होगा या फिर दुनिया एक और बड़े भू-राजनीतिक संकट की ओर बढ़ेगी।
written by:- Anjali Mishra
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