भारत में बड़े जनआंदोलनों की चर्चा जब भी होती है, तो अन्ना हजारे के आंदोलन का उदाहरण अक्सर सामने आता है। अब सोनम वांगचुक से जुड़े मौजूदा आंदोलन की तुलना भी अन्ना आंदोलन से की जा रही है। दोनों आंदोलनों का मकसद और मुद्दे अलग हैं, लेकिन जिस तरह से जनता की भागीदारी, राजनीतिक प्रतिक्रिया और मीडिया कवरेज को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उसने इस तुलना को जन्म दिया है। समर्थकों का कहना है कि अन्ना आंदोलन के समय जिस तरह सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत हुई थी, वैसा माहौल आज दिखाई नहीं दे रहा है।
अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान तत्कालीन सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए मंत्रियों की एक कमेटी बनाई थी। इस बातचीत में उस समय अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी जैसे प्रमुख चेहरे आंदोलन की तरफ से सक्रिय भूमिका में नजर आए थे। आंदोलन के पास कुछ ऐसे चेहरे थे जिन्हें जनता आसानी से पहचानती थी और जो सरकार के साथ बातचीत में भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे। यही वजह है कि अन्ना आंदोलन को एक संगठित और स्पष्ट नेतृत्व वाला आंदोलन माना जाता है।
उस दौर में मीडिया कवरेज को लेकर भी काफी चर्चा होती है। अन्ना आंदोलन के समर्थकों का दावा है कि उस समय टीवी चैनलों और अखबारों ने आंदोलन को लगातार प्रमुखता दी और देशभर में इसकी खबरें पहुंचीं। आंदोलन से जुड़ी हर बड़ी गतिविधि मीडिया की सुर्खियों में रहती थी, जिससे आंदोलन का प्रभाव तेजी से बढ़ा। वहीं, आज सोनम वांगचुक से जुड़े आंदोलन को लेकर कुछ लोगों का कहना है कि उसे वैसी व्यापक मीडिया कवरेज नहीं मिल रही, जैसी अन्ना आंदोलन के समय देखने को मिली थी।
हालांकि, अन्ना आंदोलन को लेकर राजनीतिक समर्थन की चर्चा भी हमेशा होती रही है। कुछ विश्लेषकों और आलोचकों का दावा रहा है कि उस समय बीजेपी और आरएसएस के कुछ वर्गों ने आंदोलन को समर्थन दिया था या उसके प्रति सहानुभूति दिखाई थी। दूसरी ओर, आंदोलन के समर्थक इस दावे से अलग राय रखते हैं और इसे जनता के भ्रष्टाचार विरोधी आक्रोश का परिणाम बताते हैं। इसलिए अन्ना आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव और उसके पीछे मौजूद समर्थन को लेकर आज भी अलग-अलग मत हैं।
वहीं सोनम वांगचुक से जुड़े मौजूदा आंदोलन की प्रकृति को कई लोग अलग मानते हैं। इस आंदोलन में CJP, छात्र संगठनों और अलग-अलग सामाजिक समूहों से जुड़े लोगों की भागीदारी बताई जा रही है। इसमें कोई एक ऐसा चेहरा या संगठनात्मक ढांचा स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता, जो पूरे आंदोलन का नेतृत्व करता दिखाई दे। यही कारण है कि इसे अन्ना आंदोलन की तुलना में ज्यादा बिखरा हुआ या स्वतःस्फूर्त आंदोलन बताया जा रहा है।
सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और सरकार से जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर चर्चा में है। समर्थकों का कहना है कि आंदोलन का उद्देश्य छात्रों और युवाओं से जुड़े सवालों को सरकार तक पहुंचाना है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि आंदोलन को व्यापक राजनीतिक असर पैदा करने के लिए एक स्पष्ट रणनीति, मजबूत संगठन और प्रभावी नेतृत्व की जरूरत है।
दोनों आंदोलनों के बीच एक बड़ा अंतर यह भी बताया जा रहा है कि अन्ना आंदोलन के दौरान सरकार ने बातचीत का रास्ता अपनाया था और आंदोलन के प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक बातचीत हुई थी। मौजूदा आंदोलन को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच उसी तरह का संवाद स्थापित हो पाएगा या नहीं। अगर बातचीत का कोई ठोस मंच बनता है, तो आंदोलन की दिशा भी बदल सकती है और सरकार के सामने उठाए जा रहे मुद्दों पर समाधान की संभावना भी बढ़ सकती है।
आखिर में सवाल यही है कि क्या आज का सोनम वांगचुक आंदोलन अन्ना आंदोलन जैसा बड़ा जनआंदोलन बन सकता है, या फिर दोनों की तुलना करना ही सही नहीं है? दोनों आंदोलनों का समय, मुद्दे, राजनीतिक परिस्थितियां और सामाजिक माहौल अलग हैं। अन्ना आंदोलन के पीछे जहां एक स्पष्ट नेतृत्व और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मीडिया कवरेज दिखाई दी थी, वहीं सोनम वांगचुक से जुड़े मौजूदा आंदोलन में अलग-अलग समूहों की भागीदारी नजर आती है। अब यह आंदोलन कितना बड़ा रूप लेता है और सरकार इसका समाधान बातचीत से निकालती है या नहीं, यही आने वाले समय में इसकी असली दिशा तय करेगा।
written by :- Anjali Mishra
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