देश में पिछले कुछ समय से पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, बेरोज़गारी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और युवाओं के आंदोलन जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं। इन घटनाओं ने बड़ी संख्या में छात्रों और युवा वर्ग के बीच असंतोष की भावना को जन्म दिया है। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की ओर से पहली बार Gen Z और Gen Alpha के साथ संवाद बढ़ाने की बात सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह केवल युवाओं से वैचारिक संवाद स्थापित करने की पहल है या बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल को देखते हुए नई पीढ़ी के साथ जुड़ने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है और आने वाले वर्षों में करोड़ों युवा पहली बार मतदान करेंगे। यही कारण है कि लगभग सभी राजनीतिक दल युवाओं को अपने एजेंडे के केंद्र में रखने की कोशिश कर रहे हैं। पहले जहां चुनावी बहसों में जाति, धर्म, क्षेत्रीय समीकरण और पारंपरिक राजनीतिक मुद्दों का अधिक प्रभाव दिखाई देता था, वहीं अब रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल अवसर और भविष्य की संभावनाएं भी प्रमुख विषय बनते जा रहे हैं। ऐसे में युवाओं के साथ सीधे संवाद की कोशिश को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Gen Z और Gen Alpha को पिछली पीढ़ियों से अलग माना जाता है क्योंकि यह वर्ग इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के दौर में बड़ा हुआ है। यह पीढ़ी तेजी से जानकारी प्राप्त करती है, विभिन्न विचारों से परिचित रहती है और सार्वजनिक नीतियों पर भी खुलकर अपनी राय व्यक्त करती है। यही कारण है कि अब केवल पारंपरिक राजनीतिक भाषण या चुनावी वादे पर्याप्त नहीं माने जाते। बड़ी संख्या में युवा रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, तकनीकी अवसर, उद्यमिता और भविष्य की स्पष्ट योजनाओं जैसे विषयों पर ठोस जवाब और परिणाम चाहते हैं।
पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने युवाओं के बीच विश्वास का सवाल भी खड़ा किया है। कई राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए और अभ्यर्थियों ने पारदर्शी एवं समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया की मांग की। इसी तरह बेरोज़गारी और रोजगार के अवसरों पर होने वाली चर्चा भी लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई है। ऐसे माहौल में यदि कोई संगठन या राजनीतिक दल युवाओं से सीधे संवाद की बात करता है, तो स्वाभाविक रूप से उस पहल को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं की बड़ी संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि विभिन्न राजनीतिक दल सोशल मीडिया अभियानों, युवा सम्मेलनों, छात्र संगठनों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से इस वर्ग तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि चुनावी राजनीति में पारंपरिक मुद्दों की जगह पूरी तरह युवा मुद्दे ले लेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास जैसे विषय पहले की तुलना में अधिक प्रमुखता प्राप्त कर रहे हैं।
RSS की इस पहल को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। समर्थकों का मानना हो सकता है कि नई पीढ़ी से संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है, जबकि आलोचक इसे बदलते राजनीतिक माहौल के अनुरूप नई रणनीति के रूप में देख सकते हैं। फिलहाल इस पहल के उद्देश्य और प्रभाव का आकलन आने वाले समय में होने वाली गतिविधियों और संवाद की दिशा पर निर्भर करेगा।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आज का युवा केवल चुनावी वादों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि नीतियों के क्रियान्वयन, अवसरों की उपलब्धता और शासन के परिणामों को भी महत्व देता है। सोशल मीडिया के दौर में किसी भी मुद्दे पर प्रतिक्रिया तेज़ी से सामने आती है और युवा वर्ग अपनी अपेक्षाओं को खुलकर व्यक्त करता है। ऐसे में किसी भी राजनीतिक दल या संगठन के लिए इस वर्ग की उम्मीदों को समझना और उनके सवालों का जवाब देना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारतीय राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे युवा मुद्दों की ओर और अधिक शिफ्ट होता है या पारंपरिक चुनावी समीकरण ही प्रमुख बने रहते हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि Gen Z और आने वाली पीढ़ी भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास, नवाचार और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर होने वाली चर्चा आने वाले वर्षों की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगी, इसका जवाब समय और मतदाता दोनों मिलकर तय करेंगे।
written by:- Anjali Mishra
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