लखनऊ में चल रहे तीन दिवसीय उत्तर प्रदेश आम महोत्सव के दौरान एक अनपेक्षित मोड़ तब आया जब इस सांस्कृतिक आयोजन की तस्वीरें राजनीति के रंग में रंग गईं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस महोत्सव के उद्घाटन के मौके पर हरे रंग के आमों के साथ एक फोटो सोशल मीडिया पर साझा की। इस फोटो में वे हाथ में कच्चे आम लिए नजर आ रहे थे, जिसे आम लोगों ने महज एक फल से जोड़कर देखा, लेकिन सियासी नजरों में यह एक प्रतीक बन गया। फोटो वायरल होने लगी और चर्चा का विषय बन गई कि सीएम कच्चे आमों के साथ क्या संकेत देना चाहते हैं।
इस फोटो पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने बिना देरी किए व्यंग्यात्मक अंदाज़ में चुटकी ली। उन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर एक पोस्ट डाली जिसमें बिना किसी का नाम लिए उन्होंने लिखा, “कच्चे आम कह रहे पकाओ मत!”। यह एक सीधा-सा मज़ाक था, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस एक लाइन ने हलचल मचा दी। सियासी गलियारों में इसे योगी सरकार पर तंज के रूप में देखा जा रहा है, खासकर उस वक्त जब 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए सभी पार्टियाँ एक-दूसरे पर जुबानी हमले तेज कर रही हैं। अखिलेश के इस बयान को योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली और नेतृत्व क्षमता पर कटाक्ष के रूप में भी लिया जा रहा है — जैसे वे अभी “पके” नहीं हैं।
अखिलेश यादव की इस पोस्ट के बाद बीजेपी की ओर से भी प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कुछ नेताओं ने इसे “घटिया मज़ाक” बताया, तो कुछ ने कहा कि “कच्चे आम वही लोग कह रहे हैं जिन्हें राजनीति की समझ अभी पूरी नहीं है।” सोशल मीडिया पर आम जनता भी दो गुटों में बंट गई — कुछ लोगों ने अखिलेश के तंज को मज़ेदार और सटीक बताया, वहीं कुछ ने इसे मुख्यमंत्री के प्रति असम्मानजनक करार दिया। ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर “कच्चे आम” ट्रेंड करने लगा और मीम्स की बाढ़ आ गई, जिनमें से कई ने योगी और अखिलेश दोनों को निशाने पर लिया।
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यह विवाद बताता है कि कैसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रतीकों, शब्दों और फोटो तक से सियासी मोर्चा खोल दिया जाता है। जहां एक ओर आम महोत्सव का उद्देश्य प्रदेश के बागवानों और कृषि को बढ़ावा देना था, वहीं दूसरी ओर यह आयोजन राजनीतिक दलों के लिए एक-दूसरे पर वार करने का अवसर बन गया। इससे साफ है कि अब राजनीति केवल मंच या चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सोशल मीडिया के एक पोस्ट या एक फोटो से भी पूरे प्रदेश की राजनीतिक दिशा प्रभावित हो सकती है। ‘कच्चा आम’ अब फल नहीं, राजनीतिक मुहावरा बन चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ता है, जो महोत्सव का आनंद लेना चाहती है, लेकिन बार-बार राजनीति की खींचतान का शिकार बन जाती है। जब एक फल तक को राजनीतिक विवाद का हिस्सा बना दिया जाए, तो यह सोचने की ज़रूरत है कि हम विकास और मुद्दों की राजनीति से कितनी दूर आ चुके हैं। अखिलेश यादव का व्यंग्य और योगी की प्रतीकात्मक तस्वीर — दोनों ही आज की राजनीति की नई परिभाषा बन चुके हैं, जहाँ प्रतीकों में ही आरोप और जवाब तलाशे जाते हैं। आने वाले चुनावों में ‘कच्चे आम’ जैसे बयान क्या रंग लाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा — पर फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में ये आम काफ़ी गरम हो चुके हैं।
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