स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR 2025) के तहत जारी मतदाता सूची के पुनरीक्षण में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि चुनाव आयोग ने जानबूझकर इस प्रक्रिया में पारदर्शिता से समझौता किया है और पहले दिए गए वादों से पलट गया है। देशभर में करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, लेकिन इन नामों को हटाने के पीछे के कारणों को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया। यह स्थिति लोकतांत्रिक प्रक्रिया और निष्पक्ष चुनाव की नींव को हिला सकती है। विपक्षी दलों ने इस अधूरी और अस्पष्ट ड्राफ्ट सूची को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है और इसे जनता की भागीदारी के अधिकार का हनन बताया है।
चुनाव आयोग ने शुरुआत में यह भरोसा दिलाया था कि सूची से हटाए गए हर नाम के साथ कारण भी स्पष्ट रूप से राजनीतिक दलों को दिया जाएगा—जैसे कि मृत्यु, स्थानांतरण, दोहराव या व्यक्ति का लापता होना। इन कारणों को साझा करने का उद्देश्य यह था कि राजनीतिक दल और आम नागरिक यह समझ सकें कि मतदाता सूची की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और विधिसम्मत तरीके से पूरी की गई है। इससे लोकतंत्र में विश्वास मजबूत होता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहती। लेकिन अब आयोग अपने उस वादे से पूरी तरह पीछे हट गया है, जिससे जनसंघठनों और राजनीतिक दलों के बीच आक्रोश है।
वर्तमान में जो सूची राजनीतिक दलों को सौंपी जा रही है, उसका शीर्षक मात्र इतना भर है: “Part wise list of elector of concerned constituency whose Enumeration Form is not submitted and whose name is not in Draft Roll 2025”. इसमें सिर्फ यह बताया गया है कि किन लोगों का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, परंतु क्यों नहीं है, इसका कोई विवरण नहीं दिया गया है। इससे यह भी अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है कि किसी व्यक्ति का नाम किसी त्रुटि, जानबूझकर हटाने या प्राकृतिक कारण से गायब हुआ है। औसतन हर विधानसभा क्षेत्र से 25,000 से 30,000 नाम हटाए गए हैं, लेकिन इनमें से किसका निधन हुआ, कौन स्थानांतरित हुआ, या कौन रिपीटेड रिकॉर्ड था—इसकी जानकारी पूरी तरह अनुपस्थित है।
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यह सूची न तो बूथ वाइज है, न ही इसमें मतदाता का पता है और न ही EPIC नंबर दिया गया है, जिससे राजनीतिक दल तुलनात्मक अध्ययन या विश्लेषण कर सकें। इससे साफ है कि चुनाव आयोग ने या तो लापरवाही से यह सूची तैयार की है या जानबूझकर महत्वपूर्ण सूचनाएं छिपाई हैं। अगर आयोग की मंशा वास्तव में पारदर्शी और लोकतांत्रिक होती, तो वह इस सूची को बूथवार तथा कारण-वार प्रकाशित करता, जिससे सभी पक्षों को न्यायिक रूप से प्रक्रिया की समीक्षा का अवसर मिलता। मौजूदा सूची न केवल अधूरी है, बल्कि संदेहास्पद भी है, और इससे यह भी आशंका बढ़ी है कि मतदाता सूची को एकतरफा रूप से प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है।
यह पूरी स्थिति अत्यंत चिंताजनक और लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ है। निर्वाचन आयोग ने पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्तियों में मृतक, शिफ्टेड, रिपीटेड और लापता मतदाताओं की अलग-अलग संख्या सार्वजनिक की थी। अब उन्हीं आंकड़ों को साझा करने से पीछे हटना इस बात का संकेत है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई से डर गया है और शायद यही कारण है कि वह प्रक्रिया की पारदर्शिता से बचने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह लोकतंत्र के साथ एक गंभीर विश्वासघात है—क्योंकि मतदाता सूची चुनावी व्यवस्था की रीढ़ होती है, और उसमें जानबूझकर की गई कोई भी अनियमितता सीधे तौर पर आम जनता के मतदान अधिकार पर कुठाराघात है। ऐसे में आयोग की जिम्मेदारी है कि वह न सिर्फ अपने फैसलों को पुनः विचारे, बल्कि पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कार्य करे।
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