गोरखपुर महोत्सव के आखिरी दिन जैसे ही मैथिली ठाकुर मंच पर पहुंचीं, पूरा माहौल अपने आप खास हो गया। उनके आते ही दर्शकों की निगाहें मंच पर टिक गईं और शुरुआती सुरों के साथ ही पंडाल में एक अलग ही ऊर्जा भर गई। यह सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि भावनाओं, यादों और अपनापन से भरा हुआ एक पल था, जिसे हर कोई महसूस कर रहा था।
मैथिली ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत भजन से की। भजन के शांत और भावपूर्ण सुरों ने पूरे पंडाल को श्रद्धा से भर दिया। लोग ध्यानमग्न होकर सुनते रहे, मोबाइल कैमरे रिकॉर्डिंग में चल पड़े और माहौल एकदम आध्यात्मिक हो गया। इसके बाद जब उन्होंने सोहर गाया, तो दृश्य ही बदल गया तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी और लोग अपनी कुर्सियों से उठकर झूमने लगे।
सोहर के बोलों के साथ जैसे ही संगीत ने रफ्तार पकड़ी, दर्शकों का उत्साह भी चरम पर पहुंच गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई इस लोकधुन के रंग में रंगा नजर आया। पंडाल में नाचते-झूमते लोग इस बात का सबूत थे कि मैथिली ठाकुर की आवाज सीधे दिल तक पहुंचती है।
कार्यक्रम के बाद बातचीत में मैथिली ठाकुर ने बेहद भावुक अंदाज़ में कहा कि गोरखपुर उनके लिए सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि बचपन से जुड़ी यादों का घर है। उन्होंने बताया कि यहीं उन्होंने अपने जीवन के कई अहम पल जिए हैं और पहली बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी यहीं मुलाकात हुई थी। उनकी बातों में गर्व से ज्यादा अपनापन झलक रहा था।
विधायक बनने को लेकर जब उनसे सवाल किया गया, तो मैथिली ने बेहद सादगी से कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि यहां तक पहुंचूंगी, यह सब जनता के प्यार और आशीर्वाद का नतीजा है।” उनके शब्दों में न घमंड था, न बनावट सिर्फ कृतज्ञता और सम्मान का भाव साफ दिखाई दे रहा था।
विधायक बनने के बाद यह उनका पहला गोरखपुर दौरा था, और उन्होंने खुलकर कहा कि यहां आकर कुछ भी बदला हुआ नहीं लगा। वही प्यार, वही अपनापन और वही सम्मान आज भी वैसा ही मिला। उन्होंने कहा कि यह देखकर दिल सचमुच खुश हो गया और लगा कि लोग उन्हें आज भी उसी मैथिली के रूप में देखते हैं।
मैथिली ठाकुर का यह बयान दर्शाता है कि लोकप्रियता और पद मिलने के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा है। गोरखपुर के लोग भी उन्हें सिर्फ एक कलाकार या जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह अपनाते हैं।
पूरे कार्यक्रम के दौरान बार-बार तालियों और नारों से यह साफ था कि गोरखपुर की जनता के दिल में मैथिली ठाकुर के लिए खास जगह है। उनका संगीत, उनकी सादगी और उनकी भावनाएं सब कुछ लोगों को जोड़ता है।
कुल मिलाकर, गोरखपुर महोत्सव का आखिरी दिन सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक मिलन था, जहां सुर, स्मृतियां और सम्मान एक साथ मंच पर उतर आए। मैथिली ठाकुर ने साबित कर दिया कि असली जीत वही होती है, जब मंच से उतरने के बाद भी दिलों में जगह बनी रहे।
written by :- Anjali Mishra
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