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मध्य प्रदेश में किसानों का गुस्सा सड़क पर, सवालों के घेरे में सरकार आख़िर कब सुनी जाएगी खेती की आवाज़?

मध्य प्रदेश के धार जिले में हज़ारों किसानों ने नेशनल हाईवे जाम करके सरकार को साफ संदेश दे दिया है कि अब अनदेखी और वादाखिलाफी स्वीकार नहीं की जाएगी। किसानों की मांग बेहद सीधी और जायज़ है सरकार फसल को एमएसपी पर खरीदे और चुनावों से पहले किए गए कर्ज़ माफी के वादों को पूरा करे। ये प्रदर्शन किसी बाहरी उकसावे का नतीजा नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा होता किसान आक्रोश है, जो अब सड़कों पर फट पड़ा है।

सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि यह आंदोलन उसी राज्य में चल रहा है, जहाँ से केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान आते हैं। जिस धरती ने कृषि मंत्री को शक्ति दी, आज वहीं का किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। किसान सड़क पर डटे हैं, अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि कृषि मंत्री दिल्ली के संसद भवन में बैठकर राजनीति और मौसम का लुत्फ उठा रहे हैं। इस विरोधाभास ने किसानों के आक्रोश को और तेज़ कर दिया है।

किसानों का कहना है कि एमएसपी पर फसल खरीदना सिर्फ एक वादा नहीं, उनकी जिंदगी और आने वाले सीज़न की नींव है। यदि फसल का सही दाम न मिले, तो किसान कर्ज़, नुकसान और मानसिक तनाव के भारी बोझ के नीचे दब जाते हैं। सरकार ने चुनाव से पहले किसानों को बड़े-बड़े सपने दिखाए थे कर्ज़ माफी, समर्थन मूल्य, राहत योजनाएँ लेकिन जमीनी हक़ीक़त कुछ अलग ही तस्वीर दिखा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब दिल्ली के किसान आंदोलन में पंजाब और हरियाणा के किसानों को “देश विरोधी”, “ख़ालिस्तानी”, “आतंकवादी” और न जाने क्या-क्या कहा गया था, तो क्या अब मध्य प्रदेश के इन किसानों को भी वही नाम दिए जाएंगे? जब अपने ही राज्य के किसान संघर्ष कर रहे हैं, तो क्या सरकार उसी भाषा में जवाब देगी जैसी उसने दिल्ली के किसानों को दी थी?

अगर दिल्ली सीमा पर बैठे किसानों को सिर्फ इसलिए अपमानित किया गया क्योंकि उन्होंने अपनी आवाज़ बुलंद की थी, तो धार के किसान क्या गलत कर रहे हैं? क्या एमएसपी की मांग करना अपराध है? क्या कर्ज़ माफी मांगना “देश विरोध” है? या फिर मुद्दा सिर्फ इतना है कि सरकार सवाल पूछने वाले हर किसान को खलनायक साबित करना चाहती है?

और यदि सरकार की भाषा वही रहती है कि आंदोलनकारी किसान “गलत” हैं तो फिर सवाल सीधे कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर जाता है। जब उनके अपने राज्य के किसान उनके खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, तो क्या किसान “आतंकवादी” कहलाएंगे या कृषि मंत्री को जिम्मेदार ठहराया जाएगा? अगर किसान देश विरोधी हैं, तो उनकेपन की पूरी जिम्मेदारी कृषि मंत्री पर क्यों नहीं जाती?

सच तो यह है कि किसान राजनीति नहीं कर रहे, वे सिर्फ अपना हक मांग रहे हैं। वे वही वादे याद दिला रहे हैं जो खुद सरकार ने किए थे। किसान न सरकार गिराना चाहते हैं, न सत्ता बदलना they just want fairness. उन्हें बस इतना चाहिए कि उनकी मेहनत का सही मूल्य मिले और उन्हें धोखा न दिया जाए।

धार का यह आंदोलन एक बार फिर इस सच्चाई को सामने लाता है कि भारत का किसान सिर्फ चुनावी मंचों की तालियों तक सीमित नहीं रह सकता। वह जाग चुका है, समझ चुका है और अब अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरने से भी हिचक नहीं रहा। सवाल बड़ा है, सरल भी क्या सरकार किसानों को सुनने की हिम्मत दिखाएगी या फिर उन्हें बदनाम करने की पुरानी रणनीति दोहराई जाएगी?

क्योंकि अंत में, किसान राजनीति नहीं कर रहा वह सिर्फ अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहा है।

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