भारतीय राजनीति में विभिन्न दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और वैचारिक टकराव आम बात हैं। हाल ही में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच राजनीतिक बयानबाजी ने सुर्खियां बटोरी हैं। इस बार विवाद का केंद्र सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती हैं।बसपा प्रमुख मायावती ने अखिलेश यादव पर घोर जातिवादी और द्वेषपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। मायावती का कहना है कि सपा और कांग्रेस का रवैया बसपा संस्थापक कांशीराम जी के प्रति हमेशा से नफरत भरा रहा है। इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है और दोनों दलों के समर्थकों के बीच बहस का विषय बन गया है।
मायावती ने 9 अक्टूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर संगोष्ठी आयोजित करने के अखिलेश यादव के ऐलान को “घोर छलावा” बताया। उन्होंने इसे उस कहावत “मुंह में राम, बगल में छुरी” के समान बताया। मायावती का आरोप है कि सपा की यह पहल केवल दिखावे के लिए है, जबकि असल में उनके अंदर जातिवादी और राजनीतिक द्वेष है।इसके अलावा मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर यह भी आरोप लगाया कि सपा ने कांशीराम के जीवनकाल में उनके आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की। उनका कहना है कि सपा ने हमेशा बसपा और कांशीराम के मूल उद्देश्य को प्रभावित करने का प्रयास किया |
मायावती ने 2008 में बसपा सरकार द्वारा बनाए गए “कांशीराम नगर” जिले के नाम को बदलने का भी उदाहरण दिया। उनका कहना है कि यह नाम बदलना जातिवादी सोच और राजनीतिक द्वेष का परिणाम था। इस तरह की नीतियों और कदमों ने बसपा समर्थकों के बीच निराशा और गहरी नाराजगी पैदा की।इस बयान से राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। यह साफ़ दिखाता है कि उत्तर प्रदेश में जातिवाद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और दलों के बीच इतिहास अभी भी वर्तमान राजनीति को प्रभावित कर रहा है। दोनों दलों के बीच टकराव आगामी चुनावों में भी नई दिशा ले सकता है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि मायावती का यह आरोप सपा और बसपा के बीच राजनीतिक और जातिगत टकराव को उजागर करता है। यह बयान केवल विवाद पैदा करने के लिए नहीं बल्कि दलों की नीतियों, इतिहास और समाज में उनकी भूमिका को लेकर गंभीर सवाल भी उठाता है।
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