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बहराइच में अफसर बनाम डीएम !

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में प्रशासनिक हलचल उस समय तेज हो गई जब पंचायत राज सेवा परिषद के नेतृत्व में जिले के कई अधिकारी और कर्मचारी डीएम मोनिका रानी के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतर आए। प्रदर्शनकारी अधिकारियों ने विकास भवन परिसर में धरना दिया और कार्य बहिष्कार का ऐलान किया। उनका आरोप है कि डीएम ने अधिकारियों के साथ बार-बार अपमानजनक व्यवहार किया है और बैठकों में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया है, जिससे अधिकारी वर्ग का मनोबल टूट रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कामकाज के दौरान डीएम की कार्यशैली सहयोगात्मक नहीं है, बल्कि एक तरह की तानाशाही का माहौल बना हुआ है।

इस आंदोलन को और अधिक गंभीरता तब मिली जब परिषद ने स्पष्ट शब्दों में प्रशासन को एक सप्ताह की अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर डीएम मोनिका रानी का तबादला नहीं किया गया तो जिलेभर में कामकाज ठप कर दिया जाएगा। परिषद के नेताओं का कहना है कि अधिकारियों का सम्मान और गरिमा उनके कामकाज की मूल भावना है, और जब एक जिलाधिकारी स्वयं अपने अधीनस्थों के साथ गलत व्यवहार करे, तो वह स्थिति असहनीय हो जाती है। विरोध करने वालों में कई वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी शामिल हैं, जिन्होंने एक स्वर में कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत स्वार्थ की नहीं, बल्कि प्रशासनिक सम्मान की है।

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वहीं दूसरी ओर डीएम मोनिका रानी ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकारते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उनका कहना है कि कुछ अधिकारी और कर्मचारी कायदे-कानूनों का पालन नहीं कर रहे थे, और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत थी। उन्होंने बताया कि जिन 27 अधिकारियों का वेतन रोका गया, वह इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने आवश्यक दस्तावेज़ समय से जमा नहीं किए या कार्यों में लापरवाही बरती। डीएम का कहना है कि जब प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखने की बात आती है, तो किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि यह विरोध एक नियोजित प्रयास हो सकता है ताकि कड़ी कार्रवाई से बचा जा सके।

यह घटनाक्रम अब केवल एक डीएम और अधीनस्थों के बीच का टकराव नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़े प्रशासनिक सवाल में तब्दील हो गया है। यदि इस मामले को जल्द सुलझाया नहीं गया, तो जिले के विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं के संचालन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट शासन और प्रशासन के बीच संतुलन की गंभीर परीक्षा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन इस मामले में किस पक्ष की बात को उचित ठहराता है और क्या कोई समझौता संभव है या फिर यह टकराव राज्य की अन्य जिलों में भी प्रशासनिक असंतोष को जन्म देगा।

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