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“PWD: एक विभाग, दो चेहरे – रामपुर से मुरादाबाद तक भ्रष्टाचार की दास्तान”

लोक निर्माण विभाग यानी PWD… नाम तो बहुत भारी है लेकिन कामों में हल्कापन इतना कि लखनऊ से लेकर रामपुर और मुरादाबाद तक घोटालों की सड़कों पर रोलर चलता दिख रहा है। राजधानी में बजट सरेंडर की ख़बरों के बाद अब जिलों की बारी है – कहीं धन की लूट तो कहीं ईमानदारी की सज़ा।

रामपुर में कहानी कुछ यूं है –
यहां तैनात अधिशासी अभियंता कृष्ण वीर पर गंभीर आरोप हैं कि इन्होंने ठेका देने का अपना ही समाजवादी मॉडल बना लिया है। प्रहरी की सलाहें किनारे, और ठेकेदारी के सारे पुल उनके खास चहेतों के नाम। अब विभागीय पारदर्शिता की जगह, पारिवारिक प्राथमिकता आ जाए तो समझ लीजिए ठेकेदारी में समाजवाद गहराता जा रहा है।

दूसरी तरफ मुरादाबाद में बसी है ‘नजरबंद ईमानदारी’ की कहानी –
यहां के अधिशासी अभियंता कुलदीप संत ने ऑफिस को बना डाला बिग बॉस हाउस – हर कोने में कैमरा। वजह? विभागीय खेलों पर लगाम कसना। छोटे इंजीनियरों की तिकड़मबाज़ी पर अंकुश लगाने के लिए संत जी ने पारदर्शिता की दीवार खड़ी की, लेकिन दिक्कत ये हो गई कि जिनके हाथ रंगे थे, वो कैमरों की रोशनी में खुद को नंगा महसूस करने लगे।

नतीजा? धरने, आरोप, प्रदर्शन… और एक ईमानदार अफसर को ‘दबाव’ में लाने की कोशिश। कुछ छुटभैय्ये इंजीनियरों ने तो सीधे संत जी की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े कर दिए। लेकिन विभाग के अंदरखाने से आवाज़ें कहती हैं कि संत न सिर्फ ईमानदार हैं, बल्कि ‘मगरमच्छों’ के लिए सबसे बड़ा खतरा भी।

अब सवाल ये –
क्या विभाग वही रहेगा जहां ईमानदारी की निगरानी को साज़िश कहा जाएगा और ठेकेदारी की मनमर्जी को सिस्टम?

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