दारुल शफा-ए-ब्लॉक में समाजवादी बाबा साहब अंबेडकर वाहिनी की राष्ट्रीय बैठक में यह स्पष्ट कर दिया गया था कि 6 दिसंबर को डॉ. भीमराव अंबेडकर की परिनिर्वाण जयंती पर लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में एक विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति तय करने और संविधान बचाने के संकल्प का अवसर माना जा रहा था। सपा मुखिया अखिलेश यादव को इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि घोषित किया गया था और पूरे प्रदेश से दलित समाज के हजारों कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद जताई गई थी। यह आयोजन सपा के लिए सामाजिक न्याय के एजेंडे को मजबूत करने का बड़ा मंच बनने जा रहा था।
लेकिन धीरे-धीरे माहौल बदल गया। जैसे ही कार्यक्रम की तैयारियां तेज हुईं, अचानक खबर आई कि इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में इस आयोजन के लिए अनुमति नहीं दी गई है। यह सूचना सामने आते ही सपा खेमे में नाराज़गी उभर आई और पार्टी ने खुलकर आरोप लगाया कि योगी सरकार राजनीतिक द्वेष के कारण कार्यक्रम को रोकने की कोशिश कर रही है। सपा नेताओं का कहना है कि अंबेडकर के नाम पर हो रहे एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम को रोकना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और यह दलित समाज की आवाज़ को दबाने का प्रयास है।
इस विवाद के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। सपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार इससे डर रही है कि अंबेडकर वाहिनी के इस बड़े mobilisation से 2027 के चुनाव की जमीन तैयार होगी और दलित समाज में सपा की पकड़ मजबूत होगी। वहीं भाजपा समर्थक हलकों का कहना है कि अनुमति से संबंधित तकनीकी कारण हो सकते हैं और इसे राजनीति से जोड़ना ठीक नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह विवाद अब खुलकर राजनीतिक रूप ले चुका है और चुनावी तापमान को और बढ़ा रहा है।
बैठक में मौजूद सपा नेताओं ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य संविधान के मूल्यों की रक्षा, सामाजिक समानता को बढ़ावा देना और बाबा साहब की विचारधारा को मजबूत करना था। अखिलेश यादव खुद इस मंच से दलित समाज को लेकर बड़े ऐलान करने की तैयारी में थे, जिनमें शिक्षा, आरक्षण और हाशिये पर मौजूद समुदायों को राजनीति में ज्यादा जगह देने जैसे मुद्दे शामिल थे। लेकिन अनुमति विवाद के बाद अब कार्यक्रम का स्थान और स्वरूप बदलने की चर्चाएँ शुरू हो गई हैं, जिससे राजनीतिक मैसेज और भी तीखा होता दिखाई दे रहा है।
वहीं दूसरी ओर दलित समाज से जुड़े सामाजिक संगठनों का कहना है कि अंबेडकर जयंती के मौके पर किसी भी कार्यक्रम को रोका जाना किसी भी सरकार पर अच्छा प्रभाव नहीं डालता। कई लोग इसे सरकारी तंत्र द्वारा ‘राजनीतिक माइक्रो-मैनेजमेंट’ की तरह देख रहे हैं। यह विवाद अब जमीन पर कार्यकर्ताओं में जोश जगाने का काम कर रहा है और इससे मुद्दा और बड़ा हो गया है।
सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि इस विवाद का फायदा उन्हें राजनीतिक रूप से मिल सकता है। अब पार्टी “अनुमति रोकना सरकार का दलित विरोधी चेहरा है” जैसे नैरेटिव को मजबूत करने में लगी है। वहीं भाजपा इस मुद्दे पर फिलहाल बयानबाज़ी से बचते हुए इसे प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला बता रही है। चुनावी राज्य में ऐसे मुद्दे अक्सर राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाते हैं और यही इस मामले में भी स्पष्ट दिख रहा है।
अखिलेश यादव ने भी इस विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और साफ कहा है कि संविधान की रक्षा की बात करने वालों से सरकार डर क्यों रही है। उन्होंने इशारों में कहा कि कार्यक्रम न भी हो, लेकिन दलित समाज को जोड़ने की प्रक्रिया रुकने वाली नहीं है। सपा इस विवाद को 2027 के चुनाव की बड़ी राजनीतिक लड़ाई के रूप में पेश कर रही है, जहां संविधान और सामाजिक न्याय मुख्य मुद्दे होंगे।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि सपा इस कार्यक्रम को नए स्थान पर आयोजित करती है या इसे किसी और तिथि पर ले जाती है। लेकिन एक बात तय है 6 दिसंबर की बहस अब आयोजन से कहीं आगे निकल चुकी है। यह विवाद सपा बनाम सरकार की राजनीतिक जंग में नया मोर्चा खोल चुका है और अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस का यह कार्यक्रम, अनुमति मिले या न मिले, आने वाले महीनों की राजनीति को प्रभावित करेगा।
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