देश के कई राज्यों में मानसून की रफ्तार अभी भी उम्मीद के मुताबिक नहीं पहुंची है और इसी बीच अल नीनो की सक्रियता को लेकर सामने आई खबरों ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो का प्रभाव मजबूत रहता है तो इसका असर वर्षा के वितरण और कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। इसी संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी स्थिति की समीक्षा तेज कर दी है और संभावित चुनौतियों से निपटने की तैयारी शुरू कर दी है।
केंद्रीय कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर मानसून की स्थिति, फसल तैयारियों और संभावित सूखा प्रभावित क्षेत्रों की समीक्षा की है। बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि जिन इलाकों में कम बारिश की आशंका है, वहां विशेष निगरानी रखी जाए और किसानों को समय रहते आवश्यक सलाह तथा सहायता उपलब्ध कराई जाए।
कृषि मंत्रालय के अनुसार, अल नीनो के संभावित प्रभावों पर नजर रखने के लिए विशेष मॉनिटरिंग सेल को सक्रिय कर दिया गया है। साथ ही क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप भी लगातार मौसम और खेती से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण कर रहा है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मौसम में किसी भी बड़े बदलाव की स्थिति में तत्काल कदम उठाए जा सकें।
मंत्रालय के प्रारंभिक आकलन के मुताबिक देश के लगभग 315 जिलों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका जताई गई है। इनमें से 111 जिलों को सबसे अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इन जिलों में सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं और कृषि काफी हद तक वर्षा पर निर्भर करती है। ऐसे क्षेत्रों में बारिश की कमी का सीधा असर किसानों की आय और फसल उत्पादन पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो एक वैश्विक मौसमी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अक्सर अल नीनो को कमजोर या असमान मानसून से जोड़कर देखा जाता है, हालांकि हर बार इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता।
यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो धान, दालें, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। कई किसान पहले ही मानसून की प्रतीक्षा में हैं और बुवाई का समय आगे बढ़ने से उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ सकती है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मौसम को लेकर चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है।
सरकार ने राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने पर भी जोर दिया है। जल संरक्षण, वैकल्पिक फसल योजना, सूखा प्रबंधन और सिंचाई संसाधनों के बेहतर उपयोग को लेकर भी रणनीति तैयार की जा रही है। कृषि वैज्ञानिकों को भी किसानों तक मौसम आधारित सलाह पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि वे परिस्थितियों के अनुसार खेती की योजना बना सकें।
हालांकि मौसम वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि मानसून का अंतिम प्रदर्शन केवल अल नीनो पर निर्भर नहीं करता। हिंद महासागर की स्थितियां, स्थानीय मौसमी कारक और अन्य वैश्विक मौसम प्रणालियां भी वर्षा को प्रभावित करती हैं। इसलिए आने वाले हफ्तों में मानसून की प्रगति पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।
फिलहाल सरकार और कृषि विभाग दोनों सतर्क हैं। सबसे बड़ी चिंता उन जिलों को लेकर है जहां खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर है। अब सबकी नजर मानसून की आगामी चाल पर टिकी है, क्योंकि अच्छी बारिश किसानों की उम्मीदों को मजबूती दे सकती है, जबकि कमजोर मानसून खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
written by:- Anjali Mishra
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