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पीपीएससी भर्ती घोटाला: जांच पर ब्रेक क्यों ?

UPPSC भर्ती घोटाले की CBI जांच में UPPSC का असहयोग जारी है। CBI निदेशक ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर अभियोजन स्वीकृति और दस्तावेज न मिलने की शिकायत की है। CBI ने चेतावनी दी है कि सहयोग न मिलने पर जांच बंद करनी पड़ सकती है।

 UPPSC में जिस भर्ती घोटाले की जांच यूपी सरकार की सिफारिश पर CBI ने शुरू की थी, उसमें UPPSC ही सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। CBI के निदेशक प्रवीण कुमार सूद की यूपी के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह को भेजी गई चिट्ठी का मजमून यही है। निदेशक ने लिखा है कि बार-बार पत्र लिखे जाने के बाद भी UPPSC न आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति दे रहा है और न ही जांच के लिए जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवा रहा है।

इस असहयोग से नाराज सीबीआई ने अब मुख्य सचिव से कहा है कि वह मामले में व्यक्तिगत तौर पर हस्तक्षेप करते हुए आयोग के चेयरमैन से दस्तावेज उपलब्ध करवाने को कहें। वरना, सहयोग की कमी के कारण समय से पहले जांच को बंद करने का निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

 UPPSC में जिस भर्ती घोटाले की जांच यूपी सरकार की सिफारिश पर CBI ने शुरू की थी, उसमें UPPSC ही सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। CBI के निदेशक प्रवीण कुमार सूद की यूपी के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह को भेजी गई चिट्ठी का मजमून यही है। निदेशक ने लिखा है कि बार-बार पत्र लिखे जाने के बाद भी UPPSC न आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति दे रहा है और न ही जांच के लिए जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवा रहा है।

इस असहयोग से नाराज सीबीआई ने अब मुख्य सचिव से कहा है कि वह मामले में व्यक्तिगत तौर पर हस्तक्षेप करते हुए आयोग के चेयरमैन से दस्तावेज उपलब्ध करवाने को कहें। वरना, सहयोग की कमी के कारण समय से पहले जांच को बंद करने का निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

Also Read: “अखिलेश यादव का संकल्प: ‘सामाजिक न्याय के राज’ से ही बदलेगा देश का भविष्य”

14 चिट्ठियों के बाद भी नहीं पूरे रेकॉर्ड नहीं मिले

निदेशक ने मई 2022 से मई 2025 के बीच भेजी गई उन 14 चिट्ठियों का तारीखवार जिक्र किया है जिसमें एपीएस-2010 और पीसीएस-2015 परीक्षा की जांच के पूरे दस्तावेज मांगे गए हैं। सीबीआई का कहना है कि अपेक्षित दस्तावेज के अभाव में जांच पूरी करना और तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है। जांच से जुड़े कई मामले इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी लंबित हैं, जिसमें समय-समय पर रिपोर्ट दाखिल करनी होती है। ऐसी रिपोर्टों में प्रगति की कमी और जांच की धीमी गति से कोर्ट में सीबीआई के साथ-साथ सरकार के प्रति भी प्रतिकूल दृष्टिकोण बनता है।

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