महाराष्ट्र में इस साल के अंत में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर कांग्रेस एक बड़े राजनीतिक दांव की तैयारी में है। पार्टी के भीतर चर्चा तेज हो गई है कि वह यह चुनाव अकेले लड़े, ताकि राज्य में अपनी खोई हुई सियासी ज़मीन को वापस पाया जा सके।
भाजपा के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बढ़ते प्रभाव से कांग्रेस चिंतित है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनाव संगठन को मजबूत करने का सुनहरा मौका हो सकते हैं।
फिलहाल कांग्रेस महाविकास अघाड़ी (एमवीए) का हिस्सा है, जिसमें शिवसेना (उद्धव गुट) और एनसीपी (शरद पवार गुट) भी शामिल हैं। लेकिन हाल ही में शिवसेना और एमएनएस की बढ़ती नजदीकियों ने कांग्रेस को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया है।
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पार्टी नेताओं का कहना है कि जिला स्तर पर स्थानीय मुद्दों पर फोकस कर भाजपा के विकास के दावों को चुनौती दी जा सकती है। पानी की समस्या, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और आरक्षण जैसे मुद्दे कांग्रेस के अभियान की धुरी होंगे।
मुंबई, पुणे, नागपुर और नासिक जैसे बड़े नगर निगम क्षेत्रों में कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ने पर गंभीरता से विचार कर रही है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही करेगा।
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इस बीच, कांग्रेस को विदर्भ क्षेत्र से बड़ी राहत मिली है। वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री राजेंद्र मुलक की पार्टी में वापसी से नागपुर और आसपास के क्षेत्रों में संगठन को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है।
2017-18 के चुनावों में भाजपा ने कई प्रमुख नगर निगमों पर कब्जा जमाया था, जिससे कांग्रेस का जनाधार कमजोर हुआ था। अब पार्टी नए सिरे से जमीनी स्तर पर काम कर, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और स्थानीय नेतृत्व को मजबूती देने की योजना पर काम कर रही है।
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