ऊर्जा विभाग एक बार फिर अपनी कार्यशैली और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को लेकर विवादों के घेरे में है। इस बार मामला इतना गंभीर और असामान्य हो गया कि खुद सरकार में राज्य मंत्री को धरने पर बैठना पड़ा। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में कारागार राज्य मंत्री सुरेश राही को ट्रांसफार्मर बदलवाने के लिए विभाग के अधिकारियों से बार-बार अनुरोध करना पड़ा, लेकिन उन्हें कोई सुनवाई नहीं मिली। जब मंत्री ने संबंधित जूनियर इंजीनियर (JE) से बात की, तो जवाब में उन्हें बेहद अपमानजनक और असंवेदनशील उत्तर मिला – “खुद ही बदल लो ट्रांसफार्मर।”
इस तरह का व्यवहार सिर्फ मंत्री नहीं, बल्कि आम जनता भी वर्षों से झेल रही है। लेकिन जब एक मंत्री को इस हद तक पहुंचना पड़े कि वो धरने पर बैठ जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है कि फिर आम आदमी की सुनवाई किस स्तर पर होती होगी? यह पूरी घटना मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद तूल पकड़ गई। मंत्री का विरोध केवल किसी एक ट्रांसफार्मर को लेकर नहीं था, बल्कि यह एक व्यापक प्रणालीगत विफलता का प्रतीक बन गया है, जिसमें जवाबदेही और संवेदनशीलता की भारी कमी दिखाई दी।
मामले को गंभीरता से लेते हुए ऊर्जा मंत्री अरविंद शर्मा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए संबंधित JE को सस्पेंड कर दिया है। साथ ही, उन्होंने पॉवर कॉर्पोरेशन के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) को सख्त चेतावनी भी जारी की। अरविंद शर्मा ने स्पष्ट कहा कि विभाग की छवि को लगातार हो रहे ऐसे मामलों से नुकसान पहुंच रहा है, और अब जवाबदेही तय की जाएगी। लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है – क्या केवल निलंबन से जमीनी हकीकत बदल पाएगी?
यह पहला मौका नहीं है जब ऊर्जा मंत्री ने अफसरों की लापरवाही को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी हो। इससे पहले भी कई बार वे बिजली कटौती, बिलिंग की अनियमितताओं और उपभोक्ताओं की समस्याओं को लेकर अधिकारियों को फटकार लगा चुके हैं। लेकिन इन तमाम चेतावनियों और कार्यवाहियों के बावजूद विभाग की कार्यप्रणाली में कोई स्थायी सुधार नहीं दिख रहा है। कहीं न कहीं यह दर्शाता है कि ऊपर से दिए गए निर्देश, नीचे तक पहुंचते-पहुंचते अपना असर खो देते हैं।
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इस घटनाक्रम ने ऊर्जा विभाग की कार्यसंस्कृति पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या कारण है कि अधिकारी जनप्रतिनिधियों की भी बात को गंभीरता से नहीं लेते? और यदि मंत्री स्तर पर भी अनदेखी हो सकती है, तो फिर एक सामान्य उपभोक्ता को कितना संघर्ष करना पड़ता होगा, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है, बल्कि यह आम जनता के विश्वास पर भी चोट है।
अब ज़रूरत है केवल निलंबन या चेतावनी की नहीं, बल्कि ऊर्जा विभाग में गहरी और स्थायी सुधारों की। तकनीकी अपग्रेडेशन के साथ-साथ, अफसरों की जवाबदेही तय करने, शिकायत निवारण तंत्र को मज़बूत करने और जमीनी स्तर पर सतर्कता बढ़ाने की ज़रूरत है। जब तक प्रणाली में पारदर्शिता और संवेदनशीलता नहीं लाई जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराती रहेंगी – और जनता, साथ ही उनके प्रतिनिधि, इसी तरह लाचार महसूस करते रहेंगे।
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