उत्तर प्रदेश विधानसभा के सत्रों पर आई हालिया रिपोर्ट ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। संविधान के अनुसार, राज्य विधानसभा की बैठकें वर्ष में कम से कम 90 दिन चलनी चाहिएं, ताकि जनता से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा हो सके और कानून निर्माण की प्रक्रिया मजबूत बनी रहे। लेकिन रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि 2017 से 2025 तक के बीजेपी शासनकाल में औसतन केवल 20 से 22 दिन ही विधानसभा की बैठकें हुईं। यह संख्या संविधान द्वारा सुझाए गए न्यूनतम दिनों का मात्र एक-चौथाई है, जो राज्य की लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
इस अवधि में सबसे उल्लेखनीय घटना 2 अक्टूबर 2019 का 36 घंटे लंबा मैराथन सत्र रहा। इसे आजादी के बाद का सबसे लंबा विधानसभा सत्र बताया गया। उस समय सरकार ने इसे “लोकतंत्र को मजबूत करने का अनूठा प्रयास” कहा था। मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने इस सत्र को ऐतिहासिक बताते हुए दावा किया कि इतने लंबे समय तक लगातार चर्चा करने से विकास और जनता के मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। लेकिन विपक्ष ने इसे एक “राजनीतिक दिखावा” करार दिया और आरोप लगाया कि सरकार ने सिर्फ रिकॉर्ड बनाने के लिए यह आयोजन किया, जबकि असल में बहस की गुणवत्ता और मुद्दों की गहराई पर ध्यान नहीं दिया गया।
PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश देश के उन बड़े राज्यों में शामिल है जहां विधानसभा सत्रों के दिनों की संख्या सबसे कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सत्रों की अवधि कम होने से विधायकों को कानूनों पर पर्याप्त चर्चा का मौका नहीं मिलता और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले जल्दबाजी में पास कर दिए जाते हैं। इसका सीधा असर पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा सत्रों की संख्या कम होने से न सिर्फ विपक्ष की भूमिका सीमित हो जाती है, बल्कि सरकार को भी अपनी नीतियों पर खुले और गहन विमर्श का अवसर नहीं मिलता। लोकतंत्र में बहस और संवाद की अहमियत सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे कार्यकाल में विधायिका के सक्रिय संचालन से ही तय होती है। इस संदर्भ में यूपी का रिकॉर्ड चिंताजनक है, खासकर तब जब यह राज्य जनसंख्या और राजनीतिक महत्व के लिहाज से देश का सबसे बड़ा है।
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सरकार की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि कम दिनों में भी अधिक काम करने और तकनीकी साधनों के इस्तेमाल से विधायी कार्य पूरे किए जा सकते हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह तर्क लोकतंत्र की बुनियादी भावना के विपरीत है, क्योंकि यहां मुद्दा सिर्फ “काम पूरा करना” नहीं, बल्कि “काम पर व्यापक चर्चा” करना है। कम समय में सत्र निपटाने से विधेयकों की गुणवत्ता, प्रभाव और जनता के हितों पर व्यापक समीक्षा का अवसर छिन जाता है।
अब यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है, और राजनीतिक विश्लेषक इसे 2027 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में भी देख रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भविष्य में सत्रों की संख्या बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे या यह रुझान जारी रहेगा। फिलहाल, रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि देश के सबसे बड़े राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की मजबूती के लिए सत्रों की संख्या में वृद्धि और बहस की गुणवत्ता पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है।
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