रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हालिया बयान ने एक बार फिर सिंध को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि “सिंध आज भले भारत में नहीं है, लेकिन सभ्यता के रूप में वह हमारा ही हिस्सा है और कौन जाने, भविष्य में फिर मिल भी जाए।” यह टिप्पणी हल्की नहीं थी; इसने इतिहास, भू-राजनीति, और सांस्कृतिक जुड़ाव की पूरी परतें खोल दीं। सिंध का नाम आते ही हजारों साल पुरानी एक ऐसी विरासत सामने आ जाती है, जिसकी गूंज आज भी हिंदुस्तान की मिट्टी, भाषा और संस्कृति में महसूस की जा सकती है।
सिंध का रिश्ता भारत से उतना ही पुराना है जितना हमारी सभ्यता का अस्तित्व। ऋग्वेद में ‘सिंधु’ का उल्लेख मिलता है वह नदी जिसके नाम पर इस पूरे उपमहाद्वीप की पहचान खड़ी हुई। प्राचीन ईरानी इसे ‘हिंदू’ कहते थे, और इसी से हिंदुस्तान शब्द जन्मा। बाद में ग्रीक लोगों ने इसे ‘इंडस’ कहा, जिससे इंडिया नाम बना। यानी सिंध केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था; वह भारत के नाम, पहचान और सभ्यता की जड़ में शामिल था। यही वजह है कि जब राजनाथ सिंह ने इसे “हमारा ही हिस्सा” कहा, तो वह सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि सांस्कृतिक सत्य बोल रहे थे।
1947 की विभाजन रेखा ने हालांकि इस ऐतिहासिक संबंध को काट दिया। मुस्लिम बहुसंख्या के चलते पूरा का पूरा सिंध पाकिस्तान को दे दिया गया। लाखों सिंधी हिंदुओं को अपने घर और जड़ें छोड़नी पड़ीं। आज भारत के हर बड़े शहर में बसे सिंधी समुदाय उस मिट्टी की महक को अपने साथ लेकर जीते हैं, जिसे वे पीछे छोड़ आए थे। लेकिन उनका दिल आज भी सिंध की कहानियों, लोकसंगीत, दरबारों और नदियों में धड़कता है यह बंधन आज भी टूटा नहीं है।
दुनिया शायद यह बात नहीं जानती, लेकिन सिंध आज भी पाकिस्तान में खुद को उपेक्षित महसूस करता है। वहाँ के लोग लंबे समय से अलग देश या अधिक स्वायत्तता की मांग उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि पाकिस्तान सरकार और सेना सिंध के संसाधनों का शोषण करती है जबकि उसके असली नागरिक गरीबी, बेरोजगारी और अधिकारों की कमी से जूझते हैं। सिंधुदेश आंदोलन और कारूनजारी जैसे स्थानीय जनआंदोलन इसी असंतोष की आवाज़ हैं। राजनाथ सिंह का बयान इसलिए सिंध के अंदर भी सुर्खियों में आ गया।
इतिहासकार कहते हैं कि सभ्यताएँ कभी सीमाओं की मोहताज नहीं होतीं। सिंध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है नदियों, व्यापार, भाषा, सूफ़ी परंपरा और प्राचीन भारत की सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने वाला प्रदेश। आज सिंध भले पाकिस्तान के नक्शे में हो, लेकिन उसकी आत्मा में हिंदुस्तान की खुशबू आज भी मौजूद है। यही वजह है कि हर बार जब सिंध का नाम उठता है, तो यह केवल राजनीति का प्रश्न नहीं बल्कि हजारों साल पुराने सांस्कृतिक रिश्तों की याद बनकर सामने आता है।
राजनाथ सिंह का संकेत यह भी समझा जा रहा है कि भारत की विदेश नीति अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव तक फैली हुई है। विशेषज्ञ इस बयान को भविष्य की geopolitics से जोड़कर भी देख रहे हैं क्या हालात बदलेंगे? क्या सिंध भविष्य में फिर भारत से जुड़ेगा? इसका जवाब आज नहीं, पर इतिहास कहता है कि सभ्यताओं की यात्रा कभी अनुमान के दायरे में नहीं होती।
अंत में, सिंध यह याद दिलाता है कि भौगोलिक सीमाएँ बदल सकती हैं, पर सांस्कृतिक सीमाएँ नहीं। नदियाँ, गीत, भाषा, स्मृतियाँ और सभ्यताएँ नक्शों की रेखाओं से कहीं बड़ी होती हैं। यही वह सच है जिसे राजनाथ सिंह के बयान ने फिर से जगाया सिंध सिर्फ एक प्रदेश नहीं, हमारी सभ्यता की जड़ है।
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