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रुपया 90 के पार… और राजनीति के पुराने घाव फिर हरे!

भारत में अर्थव्यवस्था और राजनीति कभी अलग नहीं होतीं। दोनों एक-दूसरे पर ऐसे बंधे हैं कि जैसे ही रुपया हिलता है, सियासत की जमीन भी कांप जाती है। 2013 में यही हुआ था जब रुपया 62–67 की रेंज में गया, तो नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार पर तीखे हमले किए थे। उन्होंने इसे ‘नीतिगत पंगुता’ और ‘कमज़ोर नेतृत्व’ का नतीजा बताया था। वह समय ऐसा था जब रुपया गिरना सिर्फ आर्थिक खबर नहीं था, बल्कि मोदी के भाषणों का प्रमुख हथियार बन गया था।

लेकिन 2025 की तस्वीर पूरी तरह उलट गई है। अब रुपया 90 के करीब है, और विपक्ष वही पुराने बयान निकालकर आज के पीएम से सवाल पूछ रहा है तब की आवाज़ इतनी तेज़ थी… आज चुप्पी क्यों? यह राजनीति का वह चक्र है, जो घूमकर वापस वहीं पहुंच जाता है। आज विपक्ष को वही तीर हाथ लग गए हैं, जो कभी मोदी ने UPA पर चलाए थे। और यही तुलना आज गरमागरम बहस का विषय बनी हुई है।

रुपये की गिरावट के पीछे सिर्फ घरेलू कारण नहीं हैं। वैश्विक बाजार में लगातार उठा-पटक, अमेरिका की सख्त ब्याज नीतियां, डॉलर की मजबूती, विदेशी निवेश का भारत से निकलना इन सबने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी इन झटकों से जूझ रही हैं। यही वजह है कि सरकार कहती है 2013 और 2025 की तुलना ठीक नहीं… हालात अलग हैं।” लेकिन विपक्ष का जवाब साफ है तुलना आपने ही शुरू की थी।

भारत में भी कई चुनौतियाँ रुपये पर दबाव डाल रही हैं महंगाई की ऊँचाई, राजकोषीय घाटे की चिंता, और निवेशकों का भरोसा कमजोर होना। सरकार इन्हें अस्थायी बताती है, पर आलोचक कहते हैं कि बढ़ते कर्ज और धीमी विकास दर ने स्थिति को जटिल बना दिया है। सवाल यह है कि जब सरकारें मजबूत अर्थव्यवस्था का दावा करती हैं, तो रुपया लगातार कमजोर क्यों हो रहा है?

2013 में रुपया गिरने पर जो बयान गूंज रहे थे, आज वही बयान उल्टी दिशा से आ रहे हैं। राजनीति में शब्द कभी मरते नहीं बस इंतजार करते हैं, कब दोबारा हथियार बनकर इस्तेमाल हों। आज विपक्ष सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, हर जगह एक ही बात दोहरा रहा है अगर तब रुपया गिरना नाकामी था, तो आज क्या है? यह सवाल जितना आर्थिक है, उतना ही राजनीतिक भी।

रुपये की गिरावट ने लोगों के बीच असुरक्षा की भावना भी पैदा की है। आम जनता को लगता है कि यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कारणों का खेल नहीं बल्कि घरेलू निर्णयों की भी परीक्षा है। विपक्ष यह बात जोर देकर कह रहा है कि रुपये की ये हालत देश की अर्थव्यवस्था की जड़ों में कमजोरी का संकेत है। सरकार इसे ‘सामान्य चक्र’ की तरह बताती है, लेकिन बहस थमने का नाम नहीं ले रही।

आखिरकार, कहानी यही है रुपया गिरता है, लेकिन राजनीति उठ खड़ी होती है। आर्थिक उतार-चढ़ाव हमेशा से सियासत का सबसे आसान, सबसे प्रभावी और सबसे यादगार हथियार रहा है। रुपया 90 पर पहुंचा है, पर बहस 2013 पर लौट आई है। वही तीर हैं… बस इस बार निशाना बदल गया है।

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