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न्योता न सही… भक्ति ने रास्ता दिखाया! अयोध्या में सांसद अवधेश प्रसाद की आस्था हुई सबसे ऊँची

अयोध्या में 25 नवंबर को हुए भव्य ध्वजारोहण समारोह ने पूरे देश का ध्यान खींचा, लेकिन इसी बीच एक घटना राजनीतिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गई स्थानीय सांसद अवधेश प्रसाद को इस समारोह में निमंत्रण ही नहीं मिला। संसदीय परंपरा और शिष्टाचार के अनुसार, प्रधानमंत्री के किसी भी सरकारी कार्यक्रम में स्थानीय सांसद की उपस्थिति को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसका मलाल भी था और एक अनकही पीड़ा भी, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया था।

लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर, आज सांसद अवधेश प्रसाद ने ऐसा कदम उठाया जिसने उनके व्यक्तित्व, आस्था और विनम्रता तीनों को उजागर कर दिया। उन्होंने कहा था कि चाहे न्योता मिले या न मिले, वह नंगे पांव रामलला के दर्शन करने जाएंगे, और आज उन्होंने वही किया। अपने बेटे अमित प्रसाद, बहू भाग्यश्री, बेटी डॉ. अलका, पोते अधीश और सहयोगियों के साथ वे मंदिर पहुंचे, माथा टेका और रामलला का आशीर्वाद लिया।

उनके परिवार के साथ पहुंचने पर मंदिर परिसर में एक सादगीपूर्ण लेकिन भावुक माहौल दिखाई दिया। किसी राजनीतिक तामझाम के बिना, बिना किसी विशेष व्यवस्था के, वह आम श्रद्धालुओं की तरह कतार में लगे और दर्शन किए। उनके चेहरे पर शिकायत नहीं, बल्कि श्रद्धा थी एक ऐसी श्रद्धा जो राजनीति से कहीं ऊँची और मजबूत है।

सांसद अवधेश प्रसाद का कहना है कि उन्हें मंदिर ट्रस्ट की ओर से कोई बुलावा नहीं मिला, जबकि परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में स्थानीय सांसद को शामिल किया जाता है। यह सवाल अभी भी चर्चा का विषय है कि आखिर क्यों उन्हें नजरअंदाज किया गया। यह केवल एक निमंत्रण का मामला नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि की गरिमा से जुड़ा सवाल है।

फिर भी, सांसद ने इस विवाद को अपने आचरण से शांत करने की कोशिश की। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य कार्यक्रम में शामिल होना था, लेकिन बुलावा न आने पर भी उनकी आस्था में कोई कमी नहीं आई। उनके इस कदम ने लोगों के बीच सम्मान और सहानुभूति दोनों पैदा किए हैं। कई लोग इसे भक्ति की जीत और राजनीति के अहंकार पर संस्कारों की विजय कह रहे हैं।

अयोध्या में चल रहे भव्य समारोहों के बीच यह घटना एक गहरी सीख देती है मंदिर जाने के लिए बुलावे की नहीं, मन की निष्ठा की जरूरत होती है। सांसद का यह दर्शन यात्रा इस बात को और मजबूती से साबित करती है कि आस्था कभी किसी निमंत्रण की मोहताज नहीं होती।

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