उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के लिए कांग्रेस ने ऐसा फैसला लिया है जिसने सूबे की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। राहुल गांधी से मुलाक़ात के तुरंत बाद पार्टी ने आधिकारिक ऐलान कर दिया कि कांग्रेस इस बार अकेले मैदान में उतरेगी और सपा के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा। यह घोषणा यूपी प्रभारी अविनाश पांडे ने करते हुए साफ संकेत दे दिए कि कांग्रेस अब प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए स्वतंत्र रणनीति पर खेलना चाहती है।
यह फैसला अचानक नहीं आया इसके पीछे बिहार चुनाव की करारी हार और उसके बाद कांग्रेस की अंदरूनी बैठकों में उठी चिंताओं की लंबी कहानी है। पार्टी लंबे समय से यह महसूस कर रही थी कि गठबंधन के सहारे चलने से उसकी असल ताकत और पहचान लगातार धूमिल हो रही है। ऐसे में पंचायत चुनावों को कांग्रेस ने अपने लिए “पोलिटिकल रीसेट” का मौका माना है ताकि वह खुद को फिर से एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सके।
दिल्ली में सोनिया गांधी के आवास पर हुई अहम बैठक में यूपी कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे, जहाँ चुनावी रणनीति, संगठन का पुनर्गठन और बूथ स्तर तक मजबूत तैयारी पर विस्तृत चर्चा हुई। इस बैठक के बाद पार्टी हाईकमान ने साफ कर दिया कि अब कांग्रेस राज्य में अपने दम पर एक नई शुरुआत करना चाहती है चाहे इसकी कीमत गठबंधन की सुविधा छोड़नी ही क्यों न हो।
इस कदम ने समाजवादी पार्टी को भी सतर्क कर दिया है, क्योंकि अब कांग्रेस के अलग लड़ने का सीधा असर वोटबैंक और पंचायत चुनावों की स्थानीय राजनीति पर पड़ेगा। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस का यह फैसला आने वाले विधानसभा चुनावों का ट्रेलर भी हो सकता है, जहाँ पार्टी जनता के बीच अपने खुद के मुद्दे, अपने उम्मीदवार और अपनी रणनीति लेकर उतरना चाहती है।
राहुल गांधी से मुलाक़ात के बाद यह ऐलान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह राहुल की उस पुरानी लाइन को दोहराता है “कांग्रेस को जमीन से जुड़कर खुद मजबूत बनना होगा।” पार्टी अब उसी दिशा में बढ़ती दिख रही है। पंचायत चुनाव भले ही छोटे स्तर का चुनाव माना जाता हो, लेकिन यूपी जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में इसका असर बहुत दूर तक जाता है।
अब सबकी नज़र इस बात पर टिकी है कि अकेले मैदान में उतरने के बाद कांग्रेस अपने संगठन को कितना सक्रिय कर पाती है, कितनी मजबूती से प्रचार चलाती है और ग्रामीण इलाकों में कितना भरोसा जीत पाती है। यूपी की राजनीति में यह फैसला कांग्रेस के लिए बड़ा जोखिम भी है और बड़ा अवसर भी।
कुल मिलाकर, कांग्रेस ने बिना किसी सहारे अकेले लड़ने का जो साहसिक दांव लगाया है, वह आने वाले महीनों में यूपी की राजनीति का नया समीकरण तय कर सकता है। अब देखना यह है कि क्या कांग्रेस यह बड़ा मुकाबला अकेले जीतने की क्षमता दिखा पाएगी या फिर यह फैसला पार्टी के लिए नई चुनौतियाँ लेकर आएगा लेकिन इतना तय है कि खेल अब पहले जैसा नहीं रहने वाला।
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