लोकसभा में आज चुनाव सुधारों को लेकर बेहद अहम बहस शुरू हुई, जिसमें कई बड़े मुद्दे सामने आए। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद मनीष तिवारी ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर सीधे सवाल उठाए और कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। उन्होंने EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) की सुरक्षा और वोटिंग की पारदर्शिता पर भी चिंता जताई, साथ ही SIR (Special Intelligence & Registration) की वैधता और उसके दुरुपयोग के संभावित खतरे पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, अगर चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह भरोसेमंद नहीं होगी तो लोकतंत्र की नींव पर सवाल उठेंगे।
वहीं, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में हुए हालिया उपचुनावों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां निष्पक्षता का अभाव था। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव में चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रह पाया। उनका कहना था कि जनता के विश्वास को बनाए रखना सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए और इसके लिए पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है।
बहस के दौरान कई अन्य सांसदों ने भी EVM और वीवीपैट की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या आम मतदाता को यह भरोसा दिलाया गया है कि हर वोट सही ढंग से गिना गया है। उन्होंने कहा कि तकनीक से चुनाव आसान हुआ है, लेकिन तकनीकी कमजोरियों और संभावित हैकिंग के डर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मनीष तिवारी ने यह भी उल्लेख किया कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव का खतरा हमेशा रहता है। उन्होंने सुझाव दिया कि आयोग के सदस्यों के चयन में एक स्वतंत्र समिति की भूमिका होनी चाहिए और प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे लोगों का भरोसा मजबूत होगा और चुनावी विवादों की संख्या कम होगी।
अखिलेश यादव ने विशेष रूप से UP उपचुनावों में मिली अनियमितताओं की ओर ध्यान खींचते हुए कहा कि कई जगहों पर मतदान केंद्रों पर दबाव बनाया गया, चुनाव आयोग की निगरानी पर्याप्त नहीं थी और शिकायतों का समाधान समय पर नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
कांग्रेस सांसदों ने यह भी उठाया कि SIR की वैधता और रिकॉर्डिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची और मतदाता पहचान प्रणाली को मजबूत किया जाए, ताकि कोई फर्जी वोटिंग न हो सके और हर मतदाता का हक सुरक्षित रहे। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव में किसी भी तरह के वित्तीय और राजनीतिक दबाव को रोकने के उपाय सुझाए।
बहस में यह भी जोर दिया गया कि केवल कानून बनाए रखना ही काफी नहीं, बल्कि उनका पालन और निगरानी भी जरूरी है। सांसदों ने चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की बजाय यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया कि आयोग पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह बने। इससे मतदाता का विश्वास बढ़ेगा और लोकतंत्र मजबूत होगा।
लोकसभा में उठे सवाल और सुझाव स्पष्ट कर रहे हैं कि देश में चुनाव सुधार अब सिर्फ आवश्यकता नहीं, बल्कि मजबूरी बन गई है। हर सांसद का मानना है कि लोकतंत्र की ताकत उसकी पारदर्शिता और जनता के विश्वास में छिपी है। बहस अभी जारी है और इसका असर अगले चुनाव सुधार पैकेज और विधायी सुधारों पर सीधे दिखाई देगा।
सामाजिक और राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह बहस न केवल चुनाव आयोग के कामकाज की समीक्षा का मौका है, बल्कि जनता को भी यह विश्वास दिलाने का अवसर है कि उनका वोट सुरक्षित है और लोकतंत्र मजबूत है। देश की नजरें अब इस बहस और इसके परिणामों पर टिकी हैं।
( देश और दुनिया की खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं. )
