यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) ने वर्ष 2026 के लिए उच्च शिक्षा से जुड़ा एक नया नियम लागू किया है, जिसे “उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026” नाम दिया गया है। इस नियम का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक समानता को मजबूत करना बताया जा रहा है, लेकिन इसके सामने आते ही देशभर में बहस और विरोध शुरू हो गया है। खास तौर पर सवर्ण समाज में इसे लेकर नाराजगी खुलकर सामने आ रही है और यह मुद्दा अब शिक्षा से निकलकर सीधा राजनीति और समाज के केंद्र में आ गया है।
इस बहस को और तेज़ तब मिला, जब मशहूर कवि कुमार विश्वास ने फेसबुक पर एक भावुक पोस्ट लिखते हुए खुद को “अभागा सवर्ण” बताया। उनके इस बयान ने सोशल मीडिया पर आग लगा दी। समर्थकों ने इसे सवर्ण समाज की पीड़ा की आवाज़ बताया, जबकि विरोधियों ने इसे अनावश्यक भावनात्मक प्रतिक्रिया करार दिया। कुमार विश्वास के इस एक वाक्य ने UGC के नियमों को लेकर चल रही बहस को और गहरा कर दिया।
वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रोफेसर राम गोपाल यादव ने UGC की नई गाइडलाइंस का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि देश की सैकड़ों केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी वर्ग के गिने-चुने वाइस चांसलर हैं और शेड्यूल कास्ट वर्ग से तो एक भी नहीं है। उनके मुताबिक, ओबीसी, एससी और एसटी वर्गों के अधिकार लंबे समय से दबाए जाते रहे हैं, इसलिए इन वर्गों को एक साथ लाकर प्रतिनिधित्व देना न केवल सही बल्कि जरूरी कदम है।
UGC कानून को लेकर चल रहे विरोध के बीच योगी सरकार के मंत्री संजय निषाद का बयान भी चर्चा में आ गया है। उन्होंने साफ कहा कि जब जनरल कैटेगरी को 10 फीसदी EWS आरक्षण दिया गया था, तब किसी ने विरोध नहीं किया। अब अगर सामाजिक भेदभाव को रोकने के लिए कोई कानून लाया गया है, तो उस पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है। उनका कहना था कि संसद से बने कानून पहले लागू होने चाहिए और अगर बाद में कोई कमी नजर आए, तो उसमें संशोधन किया जा सकता है।
इस बीच बीजेपी के भीतर से भी विरोध की आवाज़ें उठने लगी हैं। गोरखपुर से बीजेपी एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने UGC के नए नियमों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अध्यक्ष और सचिव को 22 जनवरी को पत्र लिखा। उन्होंने इस फैसले को बेहद कठोर बताते हुए UGC को “खलनायक” तक कह दिया। उनका आरोप है कि 2025 के गजट में केवल एससी/एसटी के लिए दंड और जुर्माने का प्रावधान था, लेकिन 2026 में इसे बदलकर ओबीसी को भी इसमें शामिल कर दिया गया, जो गलत है।
देशभर में सवर्ण समाज का विरोध लगातार तेज़ होता जा रहा है। कई जगहों पर लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार से इस नियम को वापस लेने या संशोधन की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि समानता के नाम पर एक वर्ग के साथ अन्याय किया जा रहा है और यह व्यवस्था शिक्षा के माहौल को नुकसान पहुंचा सकती है।
इसी बीच सवाल उठने लगे कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस पूरे मुद्दे पर खुलकर कुछ क्यों नहीं कह रहे हैं। हालांकि, गोरखपुर में एक लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान योगी आदित्यनाथ ने इशारों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब-जब प्रदेश में विकास की रफ्तार तेज होती है, तब-तब परिवारवादी और जातिवादी ताकतें अव्यवस्था फैलाने की कोशिश करती हैं। उनका यह बयान साफ संकेत देता है कि सरकार इसे राजनीतिक साजिश के तौर पर देख रही है।
कुल मिलाकर, UGC के नए नियम 2026 ने शिक्षा, समाज और राजनीति तीनों को एक साथ झकझोर दिया है। एक तरफ इसे सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में जरूरी कदम बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सवर्ण समाज इसे अपने अधिकारों पर चोट मान रहा है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि सरकार इस विवाद को संवाद और संशोधन से सुलझाती है या यह मुद्दा और बड़ा राजनीतिक संघर्ष बनकर उभरता है।
written by :-Anjali Mishra
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