दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं — एक वो जो परिस्थितियों के आगे हार मान लेते हैं, और दूसरे वो जो उन्हें अपने अनुकूल बना लेते हैं। जो विपरीत हालातों में भी डटे रहते हैं, वही मिसाल बनते हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले की तीन सगी बहनों — कल्पना, अर्चना और सुलोचना — ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया। पिता की असमय मृत्यु के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन इन बहनों ने हार नहीं मानी और अपने संघर्षों को अपनी ताक़त बना लिया।
हसनगंज तहसील के सुंदरपुर गांव के रहने वाले रविंद्र कुमार अनुसूचित जाति से थे और होमगार्ड की नौकरी करते थे। उनके चार बच्चे थे — तीन बेटियाँ और एक बेटा। वर्ष 2017 में बीमारी के चलते रविंद्र कुमार का निधन हो गया, जिससे परिवार आर्थिक संकट में आ गया। परिवार की ज़िम्मेदारी बड़ी बेटी कल्पना के कंधों पर आ गई।
मृतक आश्रित कोटे से कल्पना को 2018 में नौकरी मिली, जिससे परिवार की गाड़ी धीरे-धीरे चलने लगी। मां राजकुमारी और कल्पना ने मिलकर न केवल छोटे भाई-बहनों की परवरिश की, बल्कि उनकी पढ़ाई भी जारी रखी। परिवार ने गांव छोड़ उन्नाव शहर में किराए पर कमरा लेकर रहना शुरू किया, ताकि बहनें पढ़ाई कर सकें।
रविंद्र कुमार का सपना था कि उनकी बेटियाँ पुलिस में भर्ती हों। उनकी मौत के समय कल्पना 18 साल की, अर्चना 16 साल की और सुलोचना सिर्फ़ 14 साल की थीं। तीनों बहनों ने अपने पिता के अधूरे सपने को अपना लक्ष्य बना लिया। कल्पना नौकरी के साथ पढ़ाई करती रहीं, जबकि अर्चना और सुलोचना घर और पढ़ाई में संतुलन बनाकर तैयारी में जुटी रहीं।
योगी सरकार द्वारा आयोजित यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा में तीनों बहनों ने एक साथ आवेदन किया और अथक परिश्रम के बाद परीक्षा दी। जब 13 मार्च को परीक्षा का परिणाम आया, तो होली से एक दिन पहले इन बहनों को जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा मिला — तीनों का चयन यूपी पुलिस में हो गया।
गांव में इस खबर से खुशी की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों ने तीनों बहनों को बधाई दी और कहा कि इन्होंने पूरे गांव का नाम रोशन किया है। आज सुंदरपुर गांव की बेटियों के लिए यह तीनों बहनें प्रेरणा बन गई हैं। बहनों ने कहा — “यह होली हमारे जीवन की सबसे यादगार होली रहेगी। हमने अपने पिता के सपने को साकार किया है।”

