लखनऊ: राजधानी में नया शैक्षिक सत्र शुरू होते ही अभिभावकों की जेब पर भारी मार पड़ रही है। स्कूलों और प्राइवेट प्रकाशकों की मिलीभगत से किताबों और कॉपियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। किताबों के दाम औसतन 15% और कॉपियों के दाम 20% तक बढ़ चुके हैं। मजबूरी में अभिभावकों को ये महंगी किताबें खरीदनी पड़ रही हैं, क्योंकि स्कूलों ने विकल्प का रास्ता ही बंद कर दिया है।
‘कहां से खरीदना है’ तक स्कूल तय कर रहे हैं
लखनऊ के जानकीपुरम में स्थित एक नामी निजी स्कूल में पढ़ रहे छात्र की माता, रीता शर्मा बताती हैं:
“हमने जब किताबों की लिस्ट मांगी तो स्कूल ने कहा कि लिस्ट नहीं देंगे, सीधे अमुक दुकानदार से जाकर नाम और क्लास बताइए, वहीं से किताबें मिलेंगी। जब हमने वहां जाकर दाम पूछे, तो एक सेट की कीमत 6,200 रुपये बताई गई। एनसीईआरटी में वही विषय आधे दाम में मिल जाते हैं। यह तो सीधा शोषण है!”
प्रकाशक और स्कूलों की कमीशन डील
सूत्रों के अनुसार, निजी स्कूल प्रबंधक उन्हीं प्रकाशकों की किताबें चुनते हैं जो बदले में मोटा कमीशन ऑफर करते हैं। यही कारण है कि एनसीईआरटी की सस्ती और गुणवत्ता-युक्त किताबों की जगह अनियंत्रित दाम वाली प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें थोप दी जाती हैं।
शहर के एक पुस्तक विक्रेता, नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं:
“हमें स्कूल खुद बताते हैं कि किस क्लास की कौन सी किताब रखनी है। कई बार प्रकाशक पहले से स्कूलों से डील कर लेते हैं। हमें भी वही किताबें बेचनी पड़ती हैं, वरना दुकान से कोई कुछ खरीदेगा ही नहीं।”
शिक्षाविद बोले: यह शिक्षा का व्यापारीकरण है
लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षा शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. आर.पी. त्रिपाठी का कहना है:
“शिक्षा आज सेवा नहीं रही, यह पूरी तरह से व्यवसाय में बदल चुकी है। स्कूल प्रशासन और प्रकाशकों की यह सांठगांठ बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। सरकार को चाहिए कि किताबों की बिक्री और चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और नियमनबद्ध बनाए। स्कूलों को एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।”
सवाल ये है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इन गतिविधियों से अनभिज्ञ कैसे रह सकते हैं? क्या यह सब उनकी आंखों के सामने नहीं हो रहा? या फिर उनकी भी चुप्पी किसी और सांठगांठ का संकेत है?
लखनऊ ही नहीं, पूरे देश में यह एक गहराता हुआ संकट है — जहां शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब काटी जा रही है, और बच्चों को महंगी किताबों की आड़ में शिक्षा का बोझ नहीं, व्यापार का भार थोप दिया गया है। अब ज़रूरत है कि सरकार और प्रशासन इस स्कूल-कॉपी माफिया के खिलाफ ठोस और कड़े कदम उठाए — वरना शिक्षा गरीबों की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो जाएगी।

