सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस रिट याचिका पर तीखे सवाल उठाए, जिसमें 2015 के नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार मामले को छत्तीसगढ़ से ट्रांसफर करने की मांग की गई थी। यह याचिका अनुच्छेद-32 के तहत दायर की गई थी, जो मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल करने का प्रावधान देता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अभय एस. ओका ने हल्के-फुल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में पूछा, “ED रिट याचिका कैसे दाखिल कर सकता है? आपके कौन-से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है?” उन्होंने आगे टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर आप यह दावा कर रहे हैं कि ED के भी मौलिक अधिकार हैं, तो आपको दूसरों के मौलिक अधिकारों की भी चिंता करनी चाहिए।”
ED की ओर से पेश अडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस. वी. राजू ने पहले याचिका के पक्ष में दलीलें दीं, लेकिन कोर्ट की टिप्पणी के बाद उन्होंने याचिका वापस लेने की गुहार लगाई। कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए इसे वापस लेने की अनुमति दे दी।
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यह याचिका पूर्व IAS अधिकारी अनिल तुतेजा और अन्य के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के एक मामले से जुड़ी थी, जिसमें 2015 में नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा धान की खरीद और वितरण में कथित अनियमितताओं का आरोप है।
ED का दावा है कि छत्तीसगढ़ सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारी मामले को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि अनिल तुतेजा ने गवाहों को बयान बदलने के लिए प्रभावित किया, और यहाँ तक कि SIT ने भी जांच में बाधा डालने का प्रयास किया।
एक अन्य मामले में, जो कथित छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से जुड़ा है, सुप्रीम कोर्ट ने 6 दिसंबर 2024 को तुतेजा की गिरफ्तारी के तरीके पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि ACB कार्यालय में रातभर पूछताछ के बाद सुबह 4 बजे उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया, जो प्रक्रियात्मक न्याय पर सवाल खड़े करता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों ने यह संकेत दिया कि जांच एजेंसियों को भी संवैधानिक सीमाओं और अधिकारों की मर्यादा का ध्यान रखना होगा
