राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी के मामले ने एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस को तेज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम यानी SIT की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से SIT के पुनर्गठन को लेकर जवाब मांगा है। कोर्ट के इस रुख के बाद अब इस मामले की जांच और उसकी निष्पक्षता पर सबकी नजरें टिक गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से कहा गया है कि वह चाहता है कि इतने गंभीर मामले की जांच ऐसे वरिष्ठ IPS अधिकारी की अगुवाई में हो, जिसे वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों की जांच का पर्याप्त अनुभव हो। इसका मतलब साफ है कि अदालत जांच की गुणवत्ता और प्रक्रिया को लेकर गंभीरता से निगरानी कर रही है। अब उत्तर प्रदेश सरकार को कोर्ट के निर्देशों के अनुसार अपना जवाब दाखिल करना होगा और यह स्पष्ट करना होगा कि SIT के पुनर्गठन को लेकर उसका क्या रुख है।
कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद राम मंदिर से जुड़े कथित चढ़ावा विवाद की जांच एक बार फिर चर्चा में आ गई है। मामला सिर्फ कथित वित्तीय गड़बड़ी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह सवाल भी अहम हो गया है कि जांच किस तरह और किस अधिकारी के नेतृत्व में होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाली किसी भी कार्रवाई का असर आगे की जांच और मामले से जुड़े आरोपों पर पड़ सकता है।
इसी बीच समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर बीजेपी, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद पर भी निशाना साधा है। सपा का दावा है कि चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी के मामले में जिन लोगों पर आरोप लगे, उनके खिलाफ कार्रवाई हुई और कुछ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया, लेकिन अब तक बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों की ओर से उठाए जा रहे सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है।
समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि असली मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए अखिलेश यादव और टुन्नु यादव के बीच कथित फोन बातचीत को लेकर प्रचार किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि अगर बीजेपी, आरएसएस या VHP इस बातचीत को लेकर कोई दावा कर रहे हैं, तो उन्हें उसके प्रमाण भी सार्वजनिक करने चाहिए। सपा ने इस मामले में सीधे तौर पर सबूत पेश करने की चुनौती दी है।
अब इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ने मामले को और ज्यादा गरमा दिया है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट SIT की जांच और उसके नेतृत्व को लेकर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दल एक-दूसरे पर मुद्दे से ध्यान भटकाने और आरोपों का जवाब नहीं देने का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में राम मंदिर से जुड़े कथित चढ़ावा विवाद का कानूनी और राजनीतिक दोनों पहलू एक साथ चर्चा में आ गए हैं।
हालांकि, इस पूरे मामले में लगाए जा रहे राजनीतिक आरोपों और कथित फोन बातचीत से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मानने से पहले अदालत की कार्यवाही, आधिकारिक जांच और उपलब्ध सबूतों का इंतजार करना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से SIT के पुनर्गठन को लेकर उठाए गए सवाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर क्या जवाब देती है और क्या SIT की संरचना में कोई बड़ा बदलाव किया जाता है। साथ ही, क्या जांच को किसी अनुभवी वरिष्ठ IPS अधिकारी की अगुवाई में आगे बढ़ाया जाएगा? आने वाले दिनों में कोर्ट की सुनवाई और सरकार के जवाब से इस मामले की अगली दिशा तय होगी। फिलहाल राम मंदिर चढ़ावा विवाद एक बार फिर देश की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में है और इस पर आगे होने वाली हर कार्रवाई पर लोगों की नजर बनी रहेगी।
written by :- Anajli Mishra
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