आईपी गुप्ता की हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी से मुलाकात ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इंडियन इंक्लूसिव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सहरसा से विधायक के तौर पर अपनी पहचान बना चुके गुप्ता का ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के स्थापना दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना महज औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे संभावित राजनीतिक समीकरणों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह मुलाकात आने वाले समय में किसी बड़े फैसले की भूमिका भी हो सकती है।
वर्तमान में गुप्ता बिहार के महागठबंधन का हिस्सा माने जाते हैं और पिछले चुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। ऐसे में उनका ओवैसी के कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि बनकर जाना राजनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में मुस्लिम-पिछड़ा समीकरण को ध्यान में रखते हुए नई राजनीतिक रणनीति तैयार हो सकती है, जिसमें AIMIM की भूमिका बढ़ सकती है।
इस मुलाकात की खास बात यह भी है कि AIMIM ने आईपी गुप्ता के आरक्षण से जुड़े मुद्दों का खुलकर समर्थन किया है। गुप्ता लंबे समय से सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की राजनीति करते रहे हैं, और यही मुद्दा उन्हें नए सहयोगियों के करीब ला सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक राजनीति का साझा मंच बनता है, तो यह बिहार की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की रणनीति भी पिछले कुछ वर्षों में बदली है, जिसमें पार्टी ने बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की है। ऐसे में आईपी गुप्ता जैसे क्षेत्रीय नेता का जुड़ना AIMIM के लिए संगठनात्मक विस्तार का अवसर साबित हो सकता है। वहीं गुप्ता के लिए भी यह राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ाने का मंच बन सकता है।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो बिहार में पहले से ही जातीय और सामाजिक आधार पर राजनीति होती रही है। अगर गुप्ता AIMIM के साथ जाते हैं, तो इसका असर महागठबंधन की रणनीति पर भी पड़ सकता है। खासकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र की राजनीति में इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, जहां सामाजिक समीकरण काफी जटिल हैं और छोटे बदलाव भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि अभी तक आईपी गुप्ता या AIMIM की ओर से किसी औपचारिक राजनीतिक गठबंधन या पार्टी बदलने की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जिस तरह से मुलाकात को सार्वजनिक किया गया और कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी को प्रमुखता मिली, उसने अटकलों को और तेज कर दिया है। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे “संकेत राजनीति” मान रहे हैं, जिसमें बड़े फैसले से पहले माहौल तैयार किया जाता है।
गुप्ता की राजनीति की शैली भी उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है। वह खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति का चेहरा बताते हैं और लगातार आरक्षण, शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं। AIMIM भी सामाजिक-राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात करती रही है, इसलिए दोनों की विचारधाराओं में कुछ समानता दिखाई देती है, जो संभावित गठबंधन की जमीन तैयार कर सकती है।
अगर भविष्य में आईपी गुप्ता AIMIM में शामिल होते हैं, तो यह सिर्फ एक नेता का पार्टी बदलना नहीं होगा, बल्कि बिहार की राजनीतिक दिशा में नए प्रयोग की शुरुआत भी हो सकती है। इससे विपक्षी दलों की रणनीति बदल सकती है और नए वोट समीकरण बन सकते हैं, जिसका असर आने वाले चुनावों में साफ दिख सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह मुलाकात केवल राजनीतिक शिष्टाचार थी या किसी बड़े फैसले की प्रस्तावना? आने वाले दिनों में आईपी गुप्ता के कदम तय करेंगे कि बिहार की राजनीति में सचमुच कोई बड़ा बदलाव होने वाला है या यह चर्चा सिर्फ अटकलों तक सीमित रह जाएगी।
written by :- Anjali Mishra
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