back to top
Thursday, March 5, 2026
27.3 C
Lucknow
HomeAdministrationकाशी में सौहार्द की मिसाल: 151 मुस्लिमों ने ली दीक्षा !

काशी में सौहार्द की मिसाल: 151 मुस्लिमों ने ली दीक्षा !

गुरु पूर्णिमा का पर्व बना सामाजिक समरसता का प्रतीक

काशी, जिसे सनातन संस्कृति की आत्मा कहा जाता है, इस बार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक अभूतपूर्व सामाजिक और धार्मिक समागम का साक्षी बना। पातालपुरी मठ में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं रहा, बल्कि यह एक सामुदायिक प्रार्थना और परस्पर सम्मान की अद्वितीय मिसाल बन गया। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु गुरुओं से दीक्षा लेने पहुंचे, लेकिन जो दृश्य सबसे अधिक चौंकाने वाला और प्रेरक रहा, वह था मुस्लिम समुदाय से जुड़े 151 लोगों का हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार गुरु बालक देवाचार्य से दीक्षा लेना। यह दृश्य धर्म के बंधनों से परे एक आध्यात्मिक अनुभव और भारतीय समाज में बढ़ते समावेशन की गवाही देता है।

पातालपुरी मठ में गूंजी आरती: जहां मतभेद नहीं, केवल भक्ति थी

गुरु बालक देवाचार्य की अगुआई में आयोजित इस आयोजन में जब मुस्लिम समुदाय के लोगों ने परंपरागत हिंदू तरीकों से दीक्षा ली और जगतगुरु की आरती उतारी, तो वह क्षण काशी की धर्मनगरी को भी नए अर्थ देने वाला बन गया। भारत में जहाँ धर्म और जाति की दीवारें आए दिन सियासत और समाज में तनाव का कारण बनती हैं, वहीं यह आयोजन उन तमाम धारणाओं को चुनौती देता है जो मानती हैं कि धार्मिक पहचान एक स्थायी विभाजन है। आरती और मंत्रोच्चार के साथ जब श्रद्धा की भाषा ने जात-पांत और मज़हब के भेद को मिटाया, तो वह नज़ारा अपने आप में ऐतिहासिक था — न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक समरसता के प्रतीक रूप में भी।

गुरु की भूमिका धर्म से ऊपर: भारत की पुरातन परंपरा का पुनर्जागरण

गुरु का स्थान भारतीय परंपरा में सदैव ईश्वर के समान माना गया है — “गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः…”। इस पावन अवसर पर जब गैर-हिंदू समुदाय के लोग गुरु की शरण में आकर आध्यात्मिक दीक्षा लेते हैं, तो यह संकेत है कि गुरु की भूमिका केवल एक पंथ विशेष तक सीमित नहीं रही। यह भारत की उस बहुधार्मिक चेतना का पुनर्जागरण है, जिसमें अध्यात्म, सद्भाव और सेवा भाव से प्रेरित होकर लोग एक-दूसरे के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता प्रदर्शित करते हैं। इस गुरु पूर्णिमा पर जो दृश्य काशी में घटित हुआ, वह बताता है कि धर्म केवल पहचान नहीं, बल्कि आचरण और अनुभव का विषय है — और गुरु वह मार्गदर्शक होते हैं जो इन सीमाओं से परे ले जाते हैं।

Also Read: चुनाव आयोग का नया आदेश: अब 45 दिन बाद डिलीट होंगे वीडियो, बढ़ी राजनीतिक हलचल

भारत की आत्मा बोले: समरसता में ही है शक्ति

गुरु पूर्णिमा की इस ऐतिहासिक घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की आत्मा विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को स्वीकारने और साथ जीने की शक्ति में है। जब एक मुसलमान श्रद्धा से हिन्दू गुरु की आरती करता है, और गुरु समान भाव से उसे आशीर्वाद देता है, तो वह दृश्य केवल संवाद नहीं, एक नई शुरुआत है। यह सामाजिक चेतना का वह स्वरूप है जिसकी आज के भारत को सबसे अधिक ज़रूरत है — जहां धर्म, परंपरा और संस्कृति बाधा नहीं, सेतु बनें। काशी में इस बार की गुरु पूर्णिमा ने यह दिखा दिया कि भारत की आत्मा आज भी जीवित है, और वह सामूहिक भक्ति और साझा श्रद्धा के माध्यम से और भी प्रज्वलित हो सकती है।

( देश और दुनिया की खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं. )

Livenewsx
Livenewsxhttp://www.livenewsx.in
we are digtal news platform.we are covering social facts politics national international news breaking
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments