लखनऊ में पिछले कुछ दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की हलचल अचानक तेज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को लेकर पुलिस को सख्त चेकिंग के निर्देश दिए, और उसी आदेश के बाद राजधानी के हजरतगंज इलाके में पुलिस ने बड़ा वेरिफिकेशन अभियान चलाया जिसने पूरे शहर में हलचल मचा दी। डालीबाग के एसटीपी के किनारे बने अस्थायी कमरों और आसपास की झुग्गियों में रहने वाले मजदूरों की पहचान जांची गई, क्योंकि शक था कि इन्हीं झुग्गियों में कई रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोग छिपकर रह रहे हैं। शहर के बीचों-बीच ऐसी गतिविधि की आशंका ने पुलिस को अलर्ट कर दिया है, और इस अभियान को बेहद गोपनीय और संवेदनशील तरीके से अंजाम दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक, यह झुग्गियां अचानक और तेजी से बसी थीं, जिससे शक और गहराया। दावा किया गया है कि इन अवैध झोपड़ियों के पीछे तालिब नाम का एक व्यक्ति है, जो एसटीपी के काम की निगरानी कर रही शापूरजी पलोंजी कंपनी में काम करता है। हैरानी की बात यह है कि तालिब के खुद बांग्लादेशी होने की भी बात सामने आ रही है, और इसी कारण उसकी गतिविधियों पर पुलिस की नजर पहले से ही थी। अब जब उसके इशारे पर झुग्गियां बसने का शक गहरा हुआ, तो पूरा मामला और गंभीर हो गया। पुलिस की टीमों ने जगह-जगह पहचान पत्र, आधार और अन्य दस्तावेजों की जांच की और कई मजदूरों से गहन पूछताछ भी की।
डालीबाग जैसा हाई-प्रोफाइल इलाका, जहां सरकारी दफ्तरों और महत्वपूर्ण संस्थानों की भरमार है, वहां विदेशी घुसपैठियों की मौजूदगी की संभावना ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। शहर में रहने वाले लोगों को इस बात का भी डर है कि ऐसे घुसपैठिए न सिर्फ गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं, बल्कि उनकी पहचान और मकसद भी स्पष्ट नहीं है। पुलिस भी इस संभावना से इंकार नहीं कर रही कि कई लोग फर्जी दस्तावेजों के सहारे मजदूरों में घुलमिल कर रह रहे हों, जिससे जांच और जटिल हो जाती है। यही वजह है कि यह अभियान एक दिन की चेकिंग भर नहीं, बल्कि लगातार निगरानी का हिस्सा बन गया है।
पुलिस के अनुसार, इलाके में रह रहे कई लोगों से पूछताछ में ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो इस मामले को साधारण वेरिफिकेशन से कहीं बड़ा दिखाते हैं। कुछ मजदूरों ने माना कि वे तालिब के कहने पर ही यहां रह रहे थे, जबकि कुछ लोग उससे कभी सीधे मिले भी नहीं लेकिन उसका नाम सबके बीच चलता था। यह भी सवाल उठ रहा है कि तालिब को यह अधिकार किसने दिया कि वह सरकारी और संवेदनशील इलाके के पास ऐसी झुग्गियां बसवा सके। इस पूरे नेटवर्क की तह तक जाने के लिए पुलिस की अलग-अलग टीमें काम कर रही हैं।
सरकार के निर्देशों के बाद पुलिस जिस तरह सक्रिय हुई है, उससे साफ है कि मामला बेहद संवेदनशील है। रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर योगी सरकार पहले भी कई बार सख्त रुख दिखा चुकी है, और इस बार राजधानी के दिल में ऐसी गतिविधि सामने आने से कार्रवाई और तेज होने की संभावना है। इस जांच में खुफिया एजेंसियों की भी भूमिका बढ़ाई गई है ताकि किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की पहचान तुरंत की जा सके और उसके नेटवर्क का पता लगाया जा सके।
इस कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में दहशत और सतर्कता दोनों बढ़ गई है। आसपास रहने वाले लोगों में चर्चा है कि ये झुग्गियां अचानक क्यों और कैसे बस गईं, और किसने इन्हें सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचाकर यहां रहने दिया। पुलिस भी इस बात पर विचार कर रही है कि आखिर ऐसे लोगों को लखनऊ में किसने जगह दी और क्यों? क्या यह सिर्फ मजदूरी का मामला है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है यह बड़ा सवाल जांच का केंद्र बना हुआ है।
फिलहाल पूरा मामला पुलिस की कड़ी निगरानी में है। रोज़ाना टीमें वहां जाती हैं, बयान दर्ज किए जाते हैं, दस्तावेज़ चेक किए जाते हैं और इलाके पर चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है। आने वाले दिनों में इस जांच से कई नए खुलासे हो सकते हैं। और यही वजह है कि आज लखनऊ में लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं डालीबाग की झुग्गियों में कौन छिपा था, और क्यों?
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