उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। इस जमीन पर एक भव्य मस्जिद और उससे जुड़े अन्य सामाजिक व जनकल्याणकारी प्रोजेक्ट तैयार करने की योजना बनाई गई थी। प्रस्तावित परियोजना का नाम ‘मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह मस्जिद’ रखा गया था और इसके निर्माण की अनुमानित लागत करीब 300 करोड़ रुपये बताई गई थी। लेकिन वर्षों बीतने के बावजूद यह परियोजना जमीन पर पूरी तरह आकार नहीं ले सकी और अब तक इसका निर्माण शुरू नहीं हो पाया है।
मस्जिद प्रोजेक्ट को लेकर शुरुआत में काफी चर्चा थी और इसे आधुनिक सुविधाओं से लैस एक बड़े धार्मिक एवं सामाजिक केंद्र के तौर पर विकसित करने की योजना सामने आई थी। बताया गया था कि इस परिसर में मस्जिद के साथ अस्पताल, सामुदायिक सुविधाएं और अन्य जनकल्याणकारी संस्थान भी बनाए जाने की योजना थी। इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर लोगों से चंदा जुटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन करीब 300 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट के मुकाबले अब तक लगभग 1.5 करोड़ रुपये ही चंदे के रूप में जुटाए जा सके हैं।
परियोजना के सामने सिर्फ आर्थिक चुनौती ही नहीं रही, बल्कि जमीन के इस्तेमाल और निर्माण से जुड़ी तकनीकी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी बड़ी बाधा बनती रही हैं। लैंड यूज में बदलाव, नक्शे की मंजूरी और अन्य जरूरी औपचारिकताओं को लेकर लंबे समय तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। यही वजह है कि जिस जमीन पर एक भव्य मस्जिद बनाने की योजना थी, वहां अब तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है। स्थानीय स्तर पर सामने आई तस्वीरों और रिपोर्टों के मुताबिक, फिलहाल इस जमीन का इस्तेमाल आसपास के बच्चे क्रिकेट खेलने के लिए करते नजर आते हैं।
इस पूरे मामले की तुलना अक्सर अयोध्या में बने राम मंदिर से भी की जाती है। राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ा और कुछ ही वर्षों में मंदिर का निर्माण पूरा होकर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। दूसरी ओर, अयोध्या से करीब 25 किलोमीटर दूर प्रस्तावित मस्जिद परियोजना अब तक निर्माण के शुरुआती चरण तक भी नहीं पहुंच सकी है। यही अंतर अब इस प्रोजेक्ट को लेकर होने वाली चर्चाओं का प्रमुख हिस्सा बन गया है।
हालांकि, मस्जिद परियोजना से जुड़े लोगों का कहना रहा है कि निर्माण में देरी के पीछे कई प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाएं जिम्मेदार हैं। किसी भी बड़े निर्माण प्रोजेक्ट के लिए जमीन के इस्तेमाल की अनुमति, नक्शे की स्वीकृति और अन्य जरूरी मंजूरियां हासिल करना आवश्यक होता है। इन प्रक्रियाओं के पूरा होने में देरी के कारण भी परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसके अलावा, निर्माण के लिए आवश्यक बड़ी धनराशि जुटाना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि आखिर 300 करोड़ रुपये के इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए सिर्फ 1.5 करोड़ रुपये ही क्यों जुट पाए? क्या लोगों में इस परियोजना को लेकर अपेक्षित रुचि नहीं रही, या फिर चंदा जुटाने की प्रक्रिया को लेकर कोई दूसरी समस्या सामने आई? दूसरी तरफ, जब तक जरूरी मंजूरियां और आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं होते, तब तक इस जमीन पर निर्माण कार्य शुरू होना मुश्किल दिखाई देता है।
‘मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह मस्जिद’ परियोजना को लेकर अब यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में इसे वास्तव में जमीन पर उतारा जा सकेगा। अगर कमेटी को निर्माण कार्य शुरू करना है, तो उसे सबसे पहले जरूरी प्रशासनिक मंजूरियां हासिल करनी होंगी और साथ ही बड़े पैमाने पर धनराशि जुटानी होगी। इसके बाद ही प्रस्तावित मस्जिद और उससे जुड़े अन्य प्रोजेक्ट को वास्तविक रूप दिया जा सकेगा।
कुल मिलाकर, अयोध्या में प्रस्तावित ‘मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह मस्जिद’ की कहानी फिलहाल एक ऐसे प्रोजेक्ट की है, जिसकी घोषणा और योजना तो बड़े स्तर पर हुई, लेकिन करीब सात साल बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। करीब 300 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट और अब तक जुटाए गए 1.5 करोड़ रुपये के बीच का बड़ा अंतर इस परियोजना की आर्थिक चुनौती को सामने रखता है। वहीं नक्शे और निर्माण से जुड़ी मंजूरियों की प्रक्रिया भी इसकी राह में बाधा बनी हुई है। अब आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कमेटी इन चुनौतियों को दूर करके इस प्रस्तावित मस्जिद का निर्माण शुरू करा पाती है या फिर यह जमीन लंबे समय तक सिर्फ एक अधूरी योजना की कहानी बनी रहती है।
written by:- Anjali Mishra
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