बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी माहौल अपने चरम पर पहुंच चुका है। प्रदेश की राजनीति इन दिनों बयानों और दावों के गर्म दौर से गुजर रही है। एक तरफ महागठबंधन ने अपने पत्ते खोलते हुए तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया है, तो वहीं एनडीए की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से किसी चेहरे की घोषणा नहीं की गई है। हालांकि, एनडीए के भीतर इसको लेकर कोई असमंजस नहीं दिख रहा, क्योंकि गठबंधन के नेताओं के बयानों से यह संकेत साफ मिल रहा है कि एक बार फिर नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार होंगे। इसी बीच लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान का बयान सियासी हलचलों को और तेज कर गया है।
चिराग पासवान ने अपने बयान में कहा कि “घोषणा कितनी बार की जाएगी?” उन्होंने यह साफ करते हुए कहा कि चुनाव का नेतृत्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही कर रहे हैं और विधायक दल के बहुमत से वही आगे भी मुख्यमंत्री बनेंगे। चिराग के इस बयान को न केवल एनडीए में एकता का संदेश माना जा रहा है, बल्कि महागठबंधन के लिए एक जवाब के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसने पहले ही तेजस्वी यादव के नाम पर चुनावी मोर्चा खोल दिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चिराग का यह बयान यह स्पष्ट करने के लिए था कि एनडीए में किसी तरह की खींचतान या मतभेद की स्थिति नहीं है, बल्कि सब एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरने को तैयार हैं।
महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव को सीएम फेस घोषित करना विपक्षी कैंप के लिए रणनीतिक कदम माना जा रहा है। आरजेडी, कांग्रेस और वामदलों का यह दांव युवाओं और बेरोजगारी के मुद्दे पर वोटों को एकजुट करने का प्रयास भी समझा जा रहा है। तेजस्वी ने पहले ही कहा है कि उनका चुनाव रोजगार, शिक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर केंद्रित रहेगा। वहीं, एनडीए इस बार विकास, सुशासन और कानून-व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है। ऐसे में दोनों गठबंधनों के बीच इस बार मुकाबला काफी दिलचस्प होने जा रहा है।
इधर, नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विपक्ष बार-बार सवाल खड़ा कर रहा है, लेकिन एनडीए खेमे में नीतीश की स्वीकार्यता अभी भी बरकरार दिख रही है। बीजेपी, जेडीयू और लोजपा (रामविलास) के नेता लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि गठबंधन के भीतर कोई मतभेद नहीं है और सबका लक्ष्य एक ही है — बिहार में एनडीए की सत्ता की वापसी। चिराग पासवान, जो कभी नीतीश कुमार के सबसे बड़े आलोचक माने जाते थे, अब पूरी तरह से एनडीए लाइन पर चलते दिख रहे हैं। उनके इस रुख ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान किया है, क्योंकि कुछ साल पहले वे खुद ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के नारे के साथ नीतीश विरोधी अभियान चला चुके थे।
बिहार की राजनीति में इस बार जातीय समीकरण, नेतृत्व की विश्वसनीयता और विकास का मुद्दा तीनों समानांतर चल रहे हैं। जहां महागठबंधन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में युवाओं और पिछड़े वर्गों को साधने में जुटा है, वहीं एनडीए नीतीश कुमार के शासन अनुभव और केंद्र की मोदी सरकार की योजनाओं के दम पर जनता के बीच जा रही है। दोनों ही पक्ष अपने-अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए रैलियों, जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से जोरदार प्रचार में लगे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि 2025 के चुनाव में जनता किस पर भरोसा जताती है — अनुभव के प्रतीक नीतीश कुमार पर या बदलाव के चेहरे तेजस्वी यादव पर। बिहार की यह सियासी जंग अब केवल दलों की नहीं, बल्कि दो राजनीतिक पीढ़ियों के बीच का संघर्ष बन चुकी है।
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