पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की किताब को लेकर हाल ही में बड़ा खुलासा हुआ है। 2020 से 2024 के बीच यह किताब रक्षा मंत्रालय से मंजूरी पाने की कोशिश कर रही है, लेकिन अब तक इसे क्लीयरेंस नहीं मिली है। आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस चार साल के दौरान मंत्रालय के पास कुल 35 किताबें समीक्षा और मंजूरी के लिए आई थीं। इनमें से ज्यादातर किताबों को अनुमति दे दी गई, लेकिन तीन किताबें अभी भी अटक गईं, और इनमें जनरल नरवणे की किताब भी शामिल है।
रक्षा विशेषज्ञ और पाठक यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इस किताब को मंजूरी देने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई। कहा जा रहा है कि ऐसे मामलों में किताब की सामग्री की जांच की जाती है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना के गोपनीय दस्तावेजों का किसी भी तरह से खुलासा न हो। लेकिन इतनी लंबी अवधि में किताब को मंजूरी न मिलना असामान्य माना जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय की क्लीयरेंस प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली होती है। इसमें विभिन्न स्तरों की समीक्षा होती है जैसे सुरक्षा और संवेदनशील जानकारियों का मूल्यांकन, किताब में किसी भी ऑपरेशन या रणनीति का खुलासा तो नहीं हो रहा, इस पर ध्यान देना। ऐसे कई कदम हैं, जिनकी वजह से मंजूरी में देरी होती है।
इसके अलावा, यह भी माना जा रहा है कि किताब के लेखन में यदि सेना के किसी वर्तमान या पूर्व नीति, संचालन या गोपनीय विवरण का उल्लेख है, तो उसे हटाने या संपादित करने के निर्देश दिए जा सकते हैं। इसी वजह से किताब लंबे समय तक अटकी रह सकती है।
जनरल नरवणे की किताब को लेकर जनता और मीडिया में जिज्ञासा और चर्चा भी बढ़ गई है। लोग जानना चाहते हैं कि सेना के पूर्व प्रमुख की किताब में क्या तथ्य और अनुभव साझा किए गए हैं, जिन्हें मंत्रालय अभी तक सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं दे रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि किताब में रक्षा और सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील पहलुओं की चर्चा हो सकती है। ऐसे मामलों में मंत्रालय का सतर्क रवैया जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की सुरक्षा खामी न हो। फिर भी सवाल यह उठता है कि इतने वर्षों तक प्रक्रिया को लंबा खींचना उचित है या नहीं।
इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया और समाचार चैनलों में भी बहस शुरू हो गई है। लोग सेना की गोपनीयता और जनता के अधिकार के बीच संतुलन पर चर्चा कर रहे हैं। कुछ का मानना है कि किताब में कोई संवेदनशील जानकारी नहीं है और इसे समय रहते मंजूरी दे दी जानी चाहिए थी।
कुल मिलाकर, जनरल नरवणे की किताब अब भी रक्षा मंत्रालय की समीक्षा प्रक्रिया में फंसी हुई है। इस मामले ने न केवल सुरक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि सेना और मंत्रालय के कामकाज में कितनी जटिलताएं हो सकती हैं। जनता और पुस्तक प्रेमियों की नजर अब इस बात पर है कि आखिरकार कब तक इस किताब को हरी झंडी मिल पाएगी और इसके अनकहे अनुभवों और जानकारियों को सभी पढ़ पाएंगे।
written by :- Anjali Mishra
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