एक समय था जब भारत खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा था। 1980 और 1990 के दशक में शुरू हुई ‘पीली क्रांति’ ने देश में तिलहन उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी और तिल जैसी फसलों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी, जिससे उम्मीद जगी थी कि भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों को घरेलू स्तर पर पूरा कर सकेगा। लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलती गई और आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है।
भारत की बढ़ती आबादी और बदलती खानपान की आदतों ने खाद्य तेलों की मांग को लगातार बढ़ाया। दूसरी ओर, घरेलू उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाया। परिणामस्वरूप मांग और उत्पादन के बीच का अंतर लगातार बढ़ता गया, जिसे पूरा करने के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ानी पड़ी। आज देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले खाद्य तेलों के माध्यम से पूरा करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारणों में से एक सस्ते आयातित तेलों की उपलब्धता रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम कीमत पर आने वाले तेलों ने घरेलू उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा में कमजोर कर दिया। जब किसानों को तिलहन फसलों से अपेक्षित लाभ नहीं मिला, तो कई क्षेत्रों में उन्होंने दूसरी फसलों की ओर रुख करना शुरू कर दिया।
कृषि क्षेत्र के जानकार यह भी बताते हैं कि समय के साथ तिलहन उत्पादन को लेकर नीतिगत प्राथमिकताएं बदलती रहीं। गेहूं और चावल जैसी फसलों की तुलना में तिलहन फसलों को उतना मजबूत और निरंतर प्रोत्साहन नहीं मिला, जितनी जरूरत थी। इसका असर उत्पादन वृद्धि की गति पर पड़ा और देश की आत्मनिर्भरता की दिशा कमजोर होती गई।
पाम ऑयल पर बढ़ती निर्भरता भी एक बड़ा कारण मानी जाती है। पाम ऑयल अपेक्षाकृत सस्ता होता है और खाद्य उद्योग में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। इसी वजह से इसका आयात लगातार बढ़ा है। हालांकि इससे उपभोक्ताओं को कम कीमत का लाभ मिला, लेकिन घरेलू तिलहन उत्पादकों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो गईं।
भारत में सरसों, सोयाबीन, मूंगफली और सूरजमुखी जैसी फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन उत्पादकता और उत्पादन क्षमता अभी भी कई विकसित कृषि देशों से पीछे मानी जाती है। बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक, सिंचाई सुविधाएं और बाजार तक आसान पहुंच जैसे क्षेत्रों में सुधार की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।
हाल के वर्षों में सरकार और कृषि विशेषज्ञों ने तिलहन उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए नई योजनाओं, अनुसंधान और किसानों को प्रोत्साहन देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। उद्देश्य यह है कि घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम की जा सके और विदेशी बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर कम हो।
हालांकि चुनौती आसान नहीं है। एक तरफ बढ़ती आबादी और खपत है, तो दूसरी तरफ किसानों की आय, बाजार प्रतिस्पर्धा और वैश्विक कीमतों का दबाव भी मौजूद है। इसलिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना भी जरूरी होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत एक बार फिर ‘पीली क्रांति’ जैसी सफलता दोहरा पाएगा और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता की दिशा में लौट सकेगा, या फिर आयात पर निर्भरता आने वाले वर्षों में और बढ़ती जाएगी। आने वाले समय में सरकार की नीतियां, किसानों की भागीदारी और कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार इस सवाल का जवाब तय करेंगे।
written by:- Anjali Mishra
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