पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही जातीय समीकरणों और किसान राजनीति पर आधारित रही है। यहां की राजनीति का मिज़ाज बाकी यूपी से अलग माना जाता है क्योंकि गन्ना किसान, जाट समाज और मुस्लिम मतदाता यहां की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसी वजह से जब भी चुनावी हवा चलती है, तो पश्चिमी यूपी का असर पूरे राज्य में देखने को मिलता है। इस समय रालोद (राष्ट्रीय लोक दल) की बढ़ती सक्रियता ने भाजपा खेमे में खलबली मचा दी है। खासकर उन इलाकों में जहां पहले भाजपा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता था, वहां अब रालोद की पकड़ मजबूत होती दिखाई दे रही है।
बागपत, जो रालोद का पारंपरिक गढ़ माना जाता है, वहां पार्टी की गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। जयंत चौधरी की सक्रियता और किसान आंदोलनों में रालोद की सीधी भागीदारी ने किसानों का भरोसा एक बार फिर उनकी पार्टी की ओर मोड़ दिया है। बागपत की गलियों और चौपालों में आज भी चौधरी चरण सिंह और अजीत सिंह का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है, और यही विरासत जयंत चौधरी को राजनीतिक आधार देती है। भाजपा विधायक यह समझ रहे हैं कि अगर यह जनसमर्थन रालोद के पक्ष में संगठित हो गया तो उनके लिए अगला चुनाव जीतना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
मेरठ और मुज़फ़्फ़रनगर जैसे जिलों की बात करें, तो यहां का राजनीतिक समीकरण हमेशा से दिलचस्प रहा है। किसान आंदोलन के बाद से जाट और मुस्लिम मतदाताओं के बीच की दूरियां कुछ हद तक कम होती दिखाई दी हैं। यह गठजोड़ रालोद के लिए सबसे बड़ा फायदा साबित हो रहा है। वहीं, भाजपा को इस बात की चिंता सता रही है कि अगर इन दोनों समुदायों का वोट एकजुट हो गया तो उनके पारंपरिक हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पीछे छूट सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा के विधायक लगातार अपनी पार्टी नेतृत्व को चेतावनी दे रहे हैं कि पश्चिमी यूपी में रणनीति पर तुरंत काम करना ज़रूरी है।
बिजनौर में भी रालोद ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। यहां गन्ना किसानों के मुद्दे, बकाया भुगतान और MSP की मांग पर लगातार आंदोलन चल रहा है। भाजपा सरकार ने किसानों को कुछ राहत देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन जमीन पर किसानों की नाराज़गी अभी भी बनी हुई है। रालोद इस नाराज़गी को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश कर रहा है और धीरे-धीरे वह इसमें सफल भी होता दिख रहा है। बिजनौर के कई इलाकों में रालोद की सभाओं में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ रही है, जो भाजपा के लिए चिंता का सबब है।
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिमी यूपी में रालोद और सपा का गठबंधन भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। यह गठबंधन अगर मजबूती से आगे बढ़ता है तो भाजपा को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासकर वे सीटें जहां जाट और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, वहां भाजपा के उम्मीदवारों के लिए समीकरण और मुश्किल हो जाएंगे। यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व अब स्थानीय नेताओं को जनता के बीच ज्यादा सक्रिय रहने और किसानों के मुद्दों पर संवेदनशील रवैया अपनाने की सलाह दे रहा है।
कुल मिलाकर, पश्चिमी यूपी की राजनीति इन दिनों नए बदलाव की ओर बढ़ रही है। भाजपा विधायकों की बेचैनी इस बात का सबूत है कि रालोद की सक्रियता को हल्के में नहीं लिया जा सकता। आने वाले चुनावों में यह इलाका सत्ता की कुर्सी का रास्ता तय कर सकता है। अगर रालोद अपनी बढ़त को बनाए रखने में कामयाब रहा और सपा जैसे दलों के साथ तालमेल बैठा लिया, तो भाजपा को पश्चिमी यूपी में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
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