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पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ा बदलाव: बिना री-पोल के शांत मतदान, सियासी जंग हुई और तीखी !

भारत निर्वाचन आयोग ने जानकारी दी है कि इस बार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में एक भी री-पोल की जरूरत नहीं पड़ी। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, खासकर पश्चिम बंगाल के संदर्भ में, जहां पहले हिंसा और अनियमितताओं के कारण कई बूथों पर दोबारा मतदान कराना पड़ता था।

चुनाव आयोग के अनुसार, इस बार मतदान प्रक्रिया काफी हद तक शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रही। सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक सख्ती के चलते बूथ स्तर पर किसी बड़ी गड़बड़ी की स्थिति नहीं बनी, जिससे चुनाव प्रक्रिया सुचारू रूप से पूरी हो सकी।

इसी बीच मतदाता भागीदारी ने भी सभी को चौंकाया है। दोनों राज्यों में रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में पहले चरण में लगभग 92.9% मतदान हुआ, जो हाल के वर्षों में सबसे अधिक आंकड़ों में से एक माना जा रहा है।

यह स्थिति इसलिए और भी दिलचस्प बन गई है क्योंकि SIR के तहत मतदाता सूची से करीब 83 लाख नाम हटाए गए थे। इसके बावजूद इतनी भारी वोटिंग ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है।

इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए भारतीय जनता पार्टी की जीत को लेकर बड़ा भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि पहले चरण में लोगों की भागीदारी यह दिखाती है कि जनता बदलाव चाहती है।

अमित शाह ने दावा किया कि जिन 152 सीटों पर पहले चरण का मतदान हुआ है, उनमें से लगभग 110 सीटें बीजेपी के पक्ष में जा सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 5 मई के बाद “अंग, बंग और कलिंग” में बीजेपी की सरकार बनेगी।

उन्होंने मौजूदा सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राज्य में विकास और कानून व्यवस्था को लेकर जनता असंतुष्ट है। हालांकि, ये दावे चुनावी राजनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं और अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में है।

दूसरी ओर, ग्राउंड लेवल पर तृणमूल कांग्रेस की बूथ मैनेजमेंट को अब भी उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा गांव और बूथ स्तर तक मजबूत बताया जाता है, जो चुनावी मुकाबले में बड़ा असर डाल सकता है।

वहीं इस बार एक और बदलाव देखने को मिला है कि भारतीय जनता पार्टी की बूथ स्तर की तैयारी पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय नजर आई। कई जगहों पर बीजेपी के कार्यकर्ता मतदान केंद्रों पर मौजूद रहे, जो पहले कम देखने को मिलता था।

कुल मिलाकर, इस बार चुनाव की लड़ाई सिर्फ वोटों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह नैरेटिव, संगठन और जमीन पर पकड़ की जंग बन चुकी है। दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं और मुकाबला काफी कड़ा होता जा रहा है।

written by :- Anjali Mishra

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