प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा में दिया गया संबोधन सत्र की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बन गया। उन्होंने ऑपरेशन सिन्दूर को भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता और सरकार के निर्णायक नेतृत्व का प्रतीक बताया। मोदी ने स्पष्ट किया कि इस अभियान में भारत ने किसी भी विदेशी ताकत के हस्तक्षेप को न केवल खारिज किया, बल्कि उन्हें यह स्पष्ट संकेत भी दिया कि भारतीय सीमाओं की सुरक्षा में अब कोई कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के आतंकी अड्डों पर सटीक और नियंत्रित कार्रवाई की गई, जिससे दुश्मन को करारा जवाब मिला। मोदी के अनुसार, यह मिशन सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और कूटनीतिक जीत भी थी, जिसने वैश्विक मंचों पर भारत की छवि को और मजबूती दी। उनके इस बयान को सत्ता पक्ष ने देशभक्ति की भावना से लबरेज बताया, जबकि विपक्ष ने इसे “राजनीतिक प्रचार” करार दिया।
हालांकि, विपक्ष ने ऑपरेशन सिन्दूर को लेकर कई तीखे सवाल खड़े किए, जिनमें सबसे मुखर आवाज कांग्रेस नेता राहुल गांधी की रही। लोकसभा में विपक्ष के नेता ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने सशस्त्र बलों को पर्याप्त “ऑपरेशनल फ्रीडम” नहीं दी। राहुल गांधी ने कहा कि यदि राजनीतिक नेतृत्व ने वायुसेना को खुलकर कार्रवाई करने दी होती, तो कई विमान बचाए जा सकते थे और ऑपरेशन अधिक प्रभावी होता। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट सहयोगियों ने सैन्य योजना में हस्तक्षेप कर सेना की रणनीतिक स्वायत्तता को बाधित किया। राहुल ने सवाल उठाया कि यदि सरकार आतंकवाद के खिलाफ इतनी ही आक्रामक है, तो पाकिस्तान के सैन्य और एयर डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को क्यों नहीं निशाना बनाया गया? इस बयान ने संसद में उबाल ला दिया और सत्ता पक्ष ने तीव्र प्रतिक्रिया दी, इसे “राष्ट्रविरोधी मानसिकता” और “सेना के मनोबल को गिराने” की कोशिश बताया।
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गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस सत्र में कांग्रेस और विशेष रूप से राहुल गांधी पर तीखा हमला किया। शाह ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस का ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा से “डावांडोल और समझौतावादी” रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने आतंकवाद को लेकर न सिर्फ स्पष्ट नीति अपनाई है, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर अंजाम भी दिया है। शाह ने कहा कि कांग्रेस हमेशा सेना को राजनीतिक फैसलों की ढाल बनाती रही है, लेकिन मोदी सरकार ने पहली बार सेना को कार्रवाई की पूरी आज़ादी दी है। उन्होंने राहुल गांधी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि “यह बेहद शर्मनाक है कि देश का एक प्रमुख नेता सैन्य ऑपरेशन में भी राजनीतिक मजा ढूंढ रहा है।” संसद में इस पर जमकर हंगामा हुआ, और सत्ता पक्ष ने राहुल के माफ़ी मांगने की मांग की।
इस पूरे घटनाक्रम ने मानसून सत्र को एक बार फिर से ‘राष्ट्रवाद बनाम विपक्ष की आलोचना’ के रंग में रंग दिया है। एक ओर मोदी सरकार इस सत्र में ऑपरेशन सिन्दूर के बहाने अपनी राष्ट्र सुरक्षा नीति को “निर्णायक और प्रभावी” साबित करने में जुटी है, वहीं विपक्ष सरकार की मंशा और सैन्य संचालन में राजनीतिक हस्तक्षेप को मुद्दा बना रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में जिस तरह से सुरक्षा और सैन्य ऑपरेशन को राजनीतिक बहस का विषय बनाया जा रहा है, वह एक खतरनाक परंपरा की ओर इशारा करता है। इससे न केवल सेना का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि भारत की विदेश नीति और सामरिक रणनीति पर भी सवाल उठते हैं। जहां एक ओर सरकार इस अवसर को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे “रणनीतिक पारदर्शिता की कमी” और “राजनीतिक स्वार्थ” से जोड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस संसद से निकलकर आम जनता के बीच कैसे गूंजती है और 2025 के राजनीतिक परिदृश्य को किस तरह प्रभावित करती है।
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