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उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे के बाद सियासी हलचल, क्या योगी होंगे अगले उपराष्ट्रपति ?

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अचानक अपने पद से इस्तीफा देकर देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। उन्होंने अपने इस्तीफे का कारण “स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें” बताया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे महज एक औपचारिक वजह माना जा रहा है। असली वजह को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है, और अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। धनखड़ का कार्यकाल अभी काफी बचा हुआ था और उनका अचानक इस्तीफा देना स्वाभाविक संदेह को जन्म देता है कि क्या यह किसी बड़े बदलाव का संकेत है। इस घटनाक्रम ने सिर्फ संवैधानिक चर्चा नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही संभावित साजिशों और भावी राजनीतिक समीकरणों पर बहस छेड़ दी है।

इस इस्तीफे के तुरंत बाद कांग्रेस सांसद दानिश अली ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराते हुए इस पूरे घटनाक्रम को आरएसएस की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक “स्पष्ट संकेत” बताया। उन्होंने कहा कि धनखड़ का 75 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले इस्तीफा देना सामान्य नहीं है और इसके पीछे कोई गहरी योजना छिपी हो सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह इस्तीफा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को राष्ट्रीय राजनीति में लाने की दिशा में पहला कदम है? दानिश अली का यह बयान न सिर्फ विपक्षी गलियारों में हलचल पैदा कर गया, बल्कि भाजपा के भीतर भी कुछ सवालों को जन्म दे गया।

योगी आदित्यनाथ को उपराष्ट्रपति पद की संभावित दावेदारी को लेकर सियासी विश्लेषक अब इसे 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि योगी का दिल्ली आना भाजपा के लिए एक ‘पावर बैलेंस’ का हिस्सा हो सकता है, जहां नरेंद्र मोदी के बाद पार्टी के अगले चेहरे को स्थापित करने की जमीन तैयार की जा रही हो। वहीं, दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी यह एक बड़ा शून्य पैदा कर सकता है, क्योंकि योगी आदित्यनाथ न सिर्फ भाजपा के मजबूत हिंदुत्व चेहरे हैं, बल्कि उन्होंने यूपी में पार्टी की स्थिति को पिछले दो चुनावों में बेहद मजबूत किया है। अगर वह राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं, तो उत्तर प्रदेश के नेतृत्व को लेकर भाजपा को एक नए समीकरण की जरूरत होगी, जो चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

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फिलहाल भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम पर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सत्ता के गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर योगी को उपराष्ट्रपति पद के लिए नामित किया जाता है, तो यह भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव की शुरुआत मानी जाएगी। यह न सिर्फ भाजपा के आंतरिक समीकरण को प्रभावित करेगा, बल्कि विपक्ष को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगा। एक ओर जहां यह फैसला भाजपा के लिए ‘हिंदुत्व के चेहरे को संवैधानिक दर्जा’ देने जैसा होगा, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे लोकतंत्र की संस्थाओं के भगवाकरण के रूप में भी प्रस्तुत कर सकता है।

कुल मिलाकर, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा एक सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया से कहीं अधिक प्रतीत हो रहा है। यह राजनीतिक शतरंज की एक ऐसी चाल हो सकती है, जिसकी अगली चालें अगले कुछ हफ्तों में स्पष्ट होंगी। अब देखना यह है कि भाजपा इस रिक्त स्थान को कैसे भरती है, और क्या योगी आदित्यनाथ वास्तव में राष्ट्रीय राजनीति की उस ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हैं, जिसकी चर्चा अब हर टीवी डिबेट और राजनीतिक लेख में छाई हुई है।

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