संघ और भाजपा के संबंध को भारतीय राजनीति में “वैचारिक संरक्षक और राजनीतिक प्रतिनिधि” की तरह देखा जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) खुद को राजनीति से दूर रखता है, लेकिन वह भाजपा की नीतियों, दिशा और नेतृत्व चयन में एक निर्णायक भूमिका निभाता है। जब संघ किसी नेता को पार्टी की “आत्मा” कहता है, तो वह केवल प्रशंसा नहीं बल्कि एक दूरगामी संदेश देता है — यह संदेश पार्टी के भीतर उन गुटों को भी होता है जो संगठन के मूल विचारों से भटक चुके हैं या जिन्हें सत्ता-संचालन की शैली पर एकाधिकार चाहिए। हाल ही में संघ ने तीन ऐसे चेहरों की ओर इशारा किया है, जिन्हें पिछले एक दशक में लगभग हाशिये पर डाल दिया गया था, लेकिन जो संघ की नज़र में संगठन की आत्मा को जीवित रखने वाले असली प्रतिनिधि हैं — संजय जोशी, नितिन गडकरी और वसुंधरा राजे।
संजय जोशी का नाम भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच एक “संगठन पुरुष” के रूप में लिया जाता है। उन्होंने जमीनी स्तर पर पार्टी को खड़ा करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। जोशी का मोदी विरोध सार्वजनिक रूप से भले ही नहीं रहा हो, लेकिन यह सर्वविदित है कि नरेंद्र मोदी के उभार के बाद उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से दूर कर दिया गया था। संघ आज भी संजय जोशी को संगठनात्मक शुचिता, सादगी और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति का प्रतीक मानता है। भाजपा में जब सत्ता और छवि की राजनीति ने संगठनात्मक मूल्य प्रणाली को पीछे छोड़ दिया, तब संघ को संजय जोशी जैसे नेताओं की याद आई, जो सत्ता नहीं, विचारधारा की सेवा करते हैं। उन्हें आगे लाने की चर्चा से ही गुजरात लॉबी में हलचल देखी जा रही है।
नितिन गडकरी, जिनकी संघ पृष्ठभूमि और साफगोई जगजाहिर है, उन्हें मोदी सरकार के सबसे परफॉर्मेंस-ओरिएंटेड मंत्री के रूप में देखा गया। उन्होंने सड़क और परिवहन जैसे मंत्रालयों में अपनी कार्यक्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया, फिर भी 2024 के बाद उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई। संघ और कई वरिष्ठ नेता गडकरी को ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ और ‘विकास-प्रधान राजनीति’ का चेहरा मानते हैं। गडकरी का सबसे बड़ा गुण यह रहा है कि वे संघ के करीब होते हुए भी सत्ता की चापलूसी नहीं करते, बल्कि अपनी बात साफ शब्दों में रखते हैं। यही कारण है कि ‘हाईकमान कल्चर’ को लेकर असहज रहने वाली गुजरात लॉबी उन्हें अपने लिए खतरा मानती है।
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वसुंधरा राजे की बात करें तो वह केवल एक राज्य की नेता नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की चतुर खिलाड़ी भी हैं। राजस्थान में वह अब भी एक बड़ा जनाधार रखती हैं, खासकर राजपूत और जाट समुदायों में। भाजपा हाईकमान ने उन्हें बार-बार दरकिनार किया, लेकिन संघ का मानना है कि उनका उपेक्षित रहना पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकता है। संघ के लिए वसुंधरा केवल एक नेता नहीं, बल्कि महिला नेतृत्व, क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समावेश की प्रतीक हैं। उनके नेतृत्व को नकारना न सिर्फ राजस्थान में पार्टी की संभावनाओं को कम करता है, बल्कि संघ के व्यापक एजेंडे — सामाजिक समरसता और समावेश — से भी टकराता है।
इन तीन नेताओं के पुनः उभार की संभावना से गुजरात लॉबी, यानी मोदी-शाह के नेतृत्व वाला समूह, बेहद असहज है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं: पहली, ये नेता हाईकमान की हर बात पर ‘हाँ’ नहीं करते। दूसरी, संघ के अधिक करीब होने के कारण इन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होता है। भाजपा में अत्यधिक केंद्रीकरण और निर्णय लेने की शक्ति का एकमात्र केंद्र बन जाने की जो प्रवृत्ति मोदी-शाह की जोड़ी ने स्थापित की है, वह इन नेताओं की स्वायत्तता और स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती। गुजरात लॉबी की यही घबराहट अब राजनीतिक हलकों में साफ़ देखी जा रही है — और यह केवल सत्ता के संतुलन को लेकर नहीं है, बल्कि पार्टी की आत्मा को लेकर भी है।
संघ का संदेश इस पूरे घटनाक्रम में बेहद साफ़ है: भाजपा का भविष्य केवल चेहरे बदलने से तय नहीं होगा। पार्टी की असली शक्ति उन लोगों में निहित है जो संगठन, विचार और ज़मीनी कार्यकर्ताओं की आत्मा को जीवित रखते हैं। संजय जोशी, गडकरी और वसुंधरा राजे जैसे नेता उसी आत्मा के वाहक हैं। संघ इन्हें पुनः महत्व देना चाहता है क्योंकि यही संगठनात्मक संतुलन बनाए रखेंगे और पार्टी को केवल सत्ता की मशीन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन बनाए रखने में मदद करेंगे। अगर इस चेतावनी को नजरअंदाज़ किया गया, तो पार्टी के भीतर सत्ता का त्रिशूल धीरे-धीरे गुजरात लॉबी के हाथों से खिसक सकता है — और तब न केवल भाजपा का भविष्य, बल्कि संघ-भाजपा की परंपरागत साझेदारी भी खतरे में पड़ सकती है।
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